सोमवार, 14 मई 2012

इतना मात -पिता मुझे आप आशीषों





हे मधुसुदन ! 
तेरे संसार की माया भी अजीब हैं 
जिसने दिया हैं अंग -अंग ,कतरा -कतरा 
उसे याद करने की रीत भी नयी अजब निराली हैं 
सोच रही हूँ अपने का पागल कह लूँ ये ठीक हैं 
ये माँ और पिता  का दिन मनाने की 
रीत दुनिया के लोगो तुम्हारी हैं 
मे तो हर सांस में लेकर अपनी माँ से 
जीती उसकी भक्ति हूँ ,
हर विषाद हर संकट में जो मुझे सिखाये मुस्कुराके जीना 
साथ उस प्रभु के नाम के साथ 
मे उस माँ के साथ हर पल जीती हूँ 
जैसी पायी मेने माँ सत्य अनुपम पिता की शिराओं से हैं 
तो केसे कह दूँ एक दिन मात -पिता आप का हैं 
मेरा क्या हैं जिस पे में ज़िंदा हूँ वो 
स्नेह सत्य भक्ति आप ही ने मुझे पैदा करके दिया 
वो सब आप का हैं 
तो केसे मे गिरते इन आसुओं से कह दूँ 
के में एक दिन आप के लिए जीती हूँ 
मे जियूं हर सांस आप के 
दिए सत्य और भक्ति को चेतन्य रखने को 
इतना मात -पिता मुझे आप आशीषों  
श्री चरणों में अनुभुति