शनिवार, 5 मई 2012

आहुति में ये प्राण ......

                                                         
हे प्रभु !
मेरे आराध्य ,
मेरे राम !
तुम्हरे सत्य सिवा कोई निधि नहीं मेरी
तुमसे ही सिखा हैं समर्पण 
तुमसे ही ली हैं आत्मा ने हर दीक्षा 
आज मेरी भक्ति ,मेरा तप ,मेरा स्नेह 
सब कुछ आक्षेपित हुआ हैं ,
मेरे राम !
आत्मा को कैसा त्रास हुआ हैं !
मेरे राम!
इस आत्मा के सदा साक्षी स्वयं तुम हो !
में सिवा तुम्हारे किसे पुकारूं ,
जो मेरे लिए कही खड़ा होगा 
मुझ अनाथ के तुम ही हो जगदीश्वर 
ये आँखे ,रुदन करता ह्रदय ,तार -तार होती आत्मा 
प्रति क्षण जर्जर होती काया 
तुममे ही विलीन होती जा रही ..........
तुम्हारी सोगंध मेरे राम 
जो तुम नहीं आये मेरी आत्मा के प्रमाण 
मै यूँ ही तुम्हारे कदमो मै रोते -रोते 
तुम्हारे चरण पखारते -पखारते 
दे दूंगी ये प्राण .
मेरे राम 
मेने हर दर्द खुशी से स्वीकार किया हैं 
लेकिन ये न सह पाऊंगी 
तुम्हे आना होगा राम 
आना होगा ,आना ही होगा 
आज संसार के छोड सारे काम 
में नहीं उठूंगी तुम्हारे कदमो को छोड 
यही  दूंगी प्राण .......या तुम चले आओ 
या स्वीकार करो 
आहुति में ये प्राण .........................
एक  रुदन करती आत्मा तुम्हारे श्री चरणों को अपने अश्रुओं से पखारती
तुम्हारी अनुभूति