शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

मेरे माधव !संग चली हु बन ह्रदयसंगिनी

प्रियतम मेरे
मेरा प्यार भी तुम
इन साँसों की बयार भी तुम
मेरी अदा भी तुम ,वफा भी तुम
जो तुम मुस्काओं तो बह्कुं मे
अब कहो तुम तुमसे लडू या
चिड़ियों सी फुद्कुं मे
कभी तुम्हारे उस काँधे या इस काँधे डोलूं मे
तुम लाख छूना चाहों पर हाथ न आऊं में
लेकिन इन झुकती निगाहों से मिल जाएँ,
एक निगाह तुम्हारी तो लजा जाऊं मे
बोलो प्रियतम
इन प्यारी स्नेह की वादियों में
तुम्हरा दर्द भरा गीत में गाऊं केसे ?
इस धवल प्रणय के
सुहाने मिलन को तुम बिन सजाऊं केसे ?
तुम तो अपनी राह पकड़ चल पड़े
माधव मथुरा ,
में तुम बिन ,तुम्हारी आस मे जी जाऊं केसे ?
तुम बिन राह नहीं मेरी ,
संग चली हु बन ह्रदयसंगिनी ,
साथ चलूंगी यूँ ही सदा
तुम चाहे छोड़े चले जाओं मुझे इस विरह में
प्राणप्रिये ,
लेकिन
ये आत्मा तो आगे खड़ी हैं तुम्हारे सदा
ले मस्तक पे कुमकुम तुम्हरा बनी हूँ
जन्मो की संगिनी
तो काहे इतना इस संसार से घबराते
पावन हैं, सतीत्व हैं
मेरा जीवन
मेरे माधव
तो काहे पग -पग मेरी इंतनी परीक्षाएं लिए जाते हो .......
संसार की कोई परीक्षा तुझसे मेरे माधव ,
मुझे अलग न कर पाएगी
हैं जीवन एक तपस्या तुम संग
तो क्या मिलन और क्या विरहन
ह्रदय से रुदय का मिलना पावन प्रीत पूजा
मेरे गिरधर जिसका तू हैं
वो मांगे और क्या दूजा ..............
प्रियतम मेरे अब तो दो मुस्काओं
छोड़ विरह का, मुरली की रास धुन ,कोई रचाओं
बावरी बहकी हैं प्रिय के आलिंगन
ऐसे में छोड़ काहे ,,,,,विरह का अलख जगाओं
श्री चरणों में माधव सखी अनुभूति