शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

मेरे पिता !

मेरे पिता !
कंहा खोये हो तुम 
तुम्हारी ये बेटी ना जाने कब से तुम्हे पुकार रही 
मुझे ले चलो ना एक बार फिर वंही
अपने स्नेह अपनत्व की छाँव 
कैसे बैठा करते थे तुम मेरे पिता 
सिरहाने मेरे 
मेरे माथे पे घुमाते हुए वो
स्नेह भरा अपना हाथ 
मुझे फिर लौटा दो ना ,
एक बार फिर वही सब
मेने बड़े होते -होते सब खो दिया हैं
मेरे पिता 
मेरी अमूल्य निधि में
तुम्हे याद
करते इन आँखों से झलकते आंसू ही शेष हैं
मुझे काहे छोड दिया 
इस दुनिया में तुमने तन्हा
दरिंदों ,जानवरों के साथ ,सवेदन हीन इंसानों के साथ
एक बार भी नहीं पलट के देखा तुमने
अपने कर्तव्य निभाने के बाद 
में वही हूँ तुम्हारे साथ
ऊँगली पकडे और तुम अपने कंधो पे बस्ता टांगे
पूछती हुयी ना जाने कितनी बात 
बड़े होने पे क्या ये सब बदल जाया करता हैं
इतना सब कुछ एक रिश्ते के जुड जाने के बाद खो जाया करता हैं
अगर मुझे पता होता तो में कभी बड़ी ना होती
यूँही चलती रहती 
तुम्हारी ऊँगली पकड़े साथ
अनुभूति



मिथ्या जगत से परे

मेरे कृष्णा !
काहे दिया हैं इस आत्मा को ये घर 
नाडीजाल से गुंथा ,मांस ,
हड्डी स्नायु और मज्जा से बना
ये भोग का घर ,
कब तक  कैद रहेगा 
ये आत्मा का पंछी 
उड़ना चाहता हैं इस मिथ्या जगत से परे
 तुम्हारे नीले आकाश में 
मुझे ले चलो अब अपनी शरण 
नहीं निभते खोखले रिश्ते 
ले चलो मुझे दूर अपनी पनाहों में
अब नहीं करता अंतस स्वीकार
झूठे भावों को 
मेरे श्री हरी सुनो इस विदिरण मन की पुकार 
दया करो हे दयानिधे !
मेरे कृपा निधान !
श्री चरणों में अनुभूति