रविवार, 16 अक्तूबर 2011

या खुदा , ये तेरी कैसी नवाजिश हैं मुझपे !


मेरे महबूब !
लगता हैं मेरे खुदा को भी मुझपे रहम आ गया
वो आज तेरा रूप धरकर , मेरे सामने चला आया

या खुदा !
ये तेरी कैसी नवाजिश हैं मुझपे

इतनि तड़प को तू एक पल में यूँ बुझा गया

धडक उठा है दिल ,धडकने लगी हैं आज रूह

मेरे खुदा !
अब तो तू मुझे मौत भी दे दे

तो कोई शिकयत न होगी

हां मरते वक्त तू यूँही मेरे सामने खड़ा रहना

जिन्दगी में मेरे खुदा तेरी इससे बड़ी कोई नवाजिश न होगी

मेरे खुदा !
लगता हैं आज महीनो बाद मेरा चाँद बादलों की ओट से निकल आया हैं

और में लूटा रही हूँ पागलो की तरह अपनी आँखों से तेरे स्नेह समन्दर के मोती
हां बिलकुल तुझसी हूँ में मेरे महबूब


अनुभूति