मंगलवार, 12 जुलाई 2011

इस स्वार्थी की विनिती


मेरे कृष्णा !
मेरे विदीर्ण मन की वेदना तुम ही जानो ,
छुट रहा हैं मुझसे कुछ ,
कुछ जुड़ता ही जा रहा हैं .
नहीं मालुम कान्हा लेकिन लगता हैं
एक पन्ना पलट जीवन का
नया पन्ना लिखा जा रहा हैं |
में नहीं कर सकुंगी
तेरे चरणों में नित
अपनी शब्द अनुभूतियों से प्रणाम
हां लेकिन तेरा आदेश आत्मा में बसा हैं जँहा रहूँ
लिखती ही रहूंगी
मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे राम !
और करती ही रहूंगी मेरी आत्मा में बसी तुम्हारी
मनमोहक श्वेत पीताम्बर धारी ,
गले में बसी उस कोस्तुभ ,
और अधरों पे सजी मुरली को प्रणाम
मेरे वासुदेव !
जिसके ह्रदय में वास हैं
माँ लक्ष्मी जिन चरणों की दासी
में भी बस कर जाऊं उन चरणों की सेवा
मुझ पे कृपा करना इतनी आप
मेरे कृष्णा !
आज इस विदीर्ण मन की पीड़ा जानो तुम
केसे कहू पल -पल खीच रहा मुझे कोई
तुमसे दूर मेरे कान्हा !
में छोड़ जाऊं तेरी सेवा ,पूजा
फिर भी तुम मुझे मत छोड़ना कान्हा !
कभी मत छोड़ना !
सदा अपने कदमो में जगह देना
इस स्वार्थी की विनिती
सुनना आज |
"श्री चरणों में अनुभूति "