सोमवार, 11 जुलाई 2011

कान्हा जी ! तेरी भक्ति का रंग


न रूप , न रंग,
न संसार
में तो रंगी हूँ
कान्हा जी !
आप के ही रंग में सौ बार
तेरी भक्ति का रंग मुझपे ऐसा चड़ा
कोई और रंग अब न चद पाए
अनुभूति

मेरे कृष्णा !धन्य हूँ में !

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
कोटि -कोटि हर भोर में अपनी अखियन के जल से ,
धोती में तुहारे चरणों को करू प्रणाम |
  मेरी आत्मा
मेरे अंतस के स्वामी
आप का स्नेह सागर न होता तो ,
ये अद्भुत भक्ति न होती ,
ये अनोखी आत्मीय आत्म आनंद अनुभूति नहीं होती
ये शब्द न होते,
ये भाव न होते ,

न ही में इस झूठे
भवसागर को पार कर
तेरी आरधना और तपस्या की दुनिया में खो पाती
ये असीम स्नेह आनंद बरसता हैं मुझपे
प्रभु तेरा |
क्या मांगू में तुझसे और कुछ कृष्णा
बिन मांगे तो
ये स्नेह शीर सागर मेरे नाम किये बेठा हैं
में अज्ञानी फिर भी
मुझको तुच्छ जान ,
मेरी अनजानी भूल क्षमा करते रहना
मेरे नीलकंठ!
देना मुझे स्नेह आशीष
तेरे रस्ते की धुल न बन सकू ,
तो कम से कम जिस पथ तुम जाओ कृष्णा
उस पथ तुम्हारे चरणों से जो कुम्हला जाएँ में ऐसा फुल बन जाऊं
में धन्य हूँ! धन्य हूँ! कोटि-कोटि धन्य हूँ!
तुम्हे अपनी आत्मा में पाके |
तुमसा कोई आलौकिक स्नेह
नहीं कृष्णा ,धन्य हूँ में !
श्री चरणों में अनुभूति