मंगलवार, 14 जून 2011

सफर


आज मेरा चाँद घने मेघो में छिपा हैं ,
शायद  वो अपनी चांदनी से खफा हैं ,
मेरे चाँद !
तेरा अक्स तो,
मेरे रोम -रोम में बसा हैं ,
मेरे हर शब्द में बसा हैं
हर अनुभूति में रचा हैं ,
हर सांस में महका हैं 
फिर क्यों तू आज ,
मुझसे दूर इन बादलों में छिपा हैं
में जानती हूँ मेरे चाँद !
मुझसे दूर उस आसमा पे ही सही 
पर तेरी आत्मा का विशवास ,
तेरा स्नेह मुझसे असीम अनुराग
बन इन धवल वस्त्रो में मुझसे लिपटा हैं |
यूँ बादलो में ओझल होकर भी.
मेरा ही कुछ भला सोचता होगा ,
या  कही किसी खुदा के सामने ,
मेरे लिए इबादत में बेठा होगा ,
लेकिन  एक बार तो मुझसे पूछ  लिया होता 
की "कैसी हो मेरी चांदनी तुम "?
महफूज हो या नहीं ?
तुम ने तन्हा छोड़ दिया मुझे 
"अपना असीम अक्ष्णु विशवास दे"
इस दुनिया के अंधरे में |
फिर भी में खफा नहीं 
मेरे चाँद !
में जानती थी ये तो तय था .
इसीलिए तो में नहीं लडती नहीं सितारों से ,
 करती रही इनकार रोती रही ,
लाख होसलो पे तुम्हारे
फिर भी इस तन्हा सफ़र में ,
हवा का कोई झोका जब मुझे छूकर जाता हैं 
तुम्हारी मासूम सी बातो ,
गीतों को और अपनी कही, की
नासमझ बातो और बेवकूफियों को दोहराता हैं |
प्रत्यश प्रमाण  हैं मेरे पागलपन  का ये सफ़र
और क्या कहू मेरे चाँद !
मेरे पास बचा क्या हैं ?
अब तो आंसू भी नहीं आते ,
समन्दर सुख गया हैं जस्बातो का ,
बस ये ही मांगती हूँ तुझसे
अपनी रहमतो की चांदनी मुझ पर 
यूँ ही अपने अम्बर से लुटाया करना ,
तेरी रहमतो से आज भी रोशन हैं मेरी राहे
बस उन्ही रास्तो के अंधरे को 
अपने असीम ,अनंत ज्ञान से रोशन करते रहना |
ताकि चमकती रहे तेरी ये चांदनी 
और तू देखता रहे उस अम्बर से अपने चांदनी को
अपना असीम अनुराग इस संसार के दुखियों पे  लुटाते |
अनुभूति

कठोरता का आशीष

मेरे श्री हरी!
मेरे नारायण!
जगदीश्वर! ,जगत्पति !
मेरे नाम लिखी हो चाहें 
आप ने  संसार की सारी पीड़ा ,
मुझे कोई पीड़ा नहीं फिर भी 
इसमें भी मेरा सुख हैं राम जी !
संसार  को दने को चाहे आप ने सुख दिया ,
लेकिन मेरे लिए आप ने कुछ तो किया ,
फिर भी धनी हूँ संसार की सबसे बड़ी में 
क्योकि मेरी आँखों से गिरती ,
हर आंसू की बूंद में सदा आप की ही पुकार
होती हैं |
इस पुरे संसार में मुझसा कोई नहीं जो
जो हर -पल घड़ी में अपनी
हर आंसू की बूंद से अपने राम को भजता हो और
आप की साँसों के करीब रहता हो
जिसके रोम- रोम में बसे हो आप 
उसे संसार की किस पीड़ा का डर|

मेरे वासुदेव!
इतनी विनती मेरी सदा तुम्हारे श्री चरणों में
मेरे राम को दीजो इतनी  शक्ति ,
इतनी कठोरता दीजो ,
की मुझे वो हजारो तीरों की नोक से बिंध दे तो भी
उनकी आत्मा विचलित न हो ,
दुखी न हो , 
कही कोई ग्लानी न अपने मन में रख पाए
वो सदा मुस्कुराएँ 
और सदा अपने एक छत्र आधिपत्य को बढ़ाते जाएँ |
बस जीवन में इतनी भक्ति मेरी तुझसे मेरे राम !
जिसे संसार में मिला हो तेरी ही साँसों में हर नाम 
उसके लिए व्यर्थ हैं रंग सारे 
निरर्थक हैं मातृत्व संस्कार 
सब कुछ तुझको अर्पण 
साँसे वचन बद्ध हैं मेरी 
नहीं तो ये भी में छोड़ देती |
ये बाकी हैं मुझमे क्योकि मुझे लड़ना हैं
ता उम्र अपनी रूह  सच के लिए
इस तुच्छ की भक्ति को स्वीकार  करो अपने चरणों में 
मेरे राम! , मेरे कोस्तुभ धारी!
में नहीं मांगू कुछ और आप से
इस संसार  में छोडू जब प्राण 
मेरे होठो से निकले तेरा ही नाम 
मेरे राम! राम! राम !
अनुभूति