सोमवार, 6 जून 2011

तुम्हारी मुस्कुराहट

इंसान ,भगवान सभी कुछ हैं
लेकिन फिर भी  में तन्हा हूँ ,
क्योकि तुम भी तो वंहा तन्हा हो |
पल -पल जब बनावटी कठोरता खीच लेती हैं जिस्म से रूह को , 
बिंध देती हैं हैं कठोर शब्दों के अघात से आत्मा को ,
सब कुछ शून्य हो जाता हैं |
हर शब्द जब रूह से निकला सत्य हैं 
तो होठो तक आते -आते बनावट क्यों हो जाता हैं |
मुझतक कभी आने वाली महकती तेरी खुशबु ,
दुसरे ही पल जहरीली क्यों जाती हैं !
क्यों चला करते हैं  अंतर द्वन्द तुम्हारे मन में
मेरी ही तरह तुम्हारी कशमकश साफ़ झलकती हैं तुम्हारी रूह में , ,
में जब होती हूँ इबादत में ,
मेरा खुदा रो रहा होता हैं अपने हाल पे ,
अपनी भीगी अखियों से मुझे कह रहा होता हैं ,
मुझे माफ़ कर दो "अनु "
में तुझे कुछ न दे सकूंगा 
न दुआ, न प्यार ,न आदेश 
और में कह रही होती हूँ |
मेरे खुदा तेरी आँखों में अश्क नहीं मंजूर मुझे ,
न तेरे दिल में कोई दर्द ,
मुझे कुछ नहीं चाहियें 
सिवा तेरे लबों  की इस पाक  मुस्कुराहट के |
मुझे जिन्दगी से महोब्बत नहीं ये नहीं कह सकती
इसीलिए मेंज़िंदा हूँ ये देख कर भी 
तुम्हारी मुस्कुराहटों को अपने दिल में लिए |
ताकि मेरे खुदा तुम समायें रहो 
अपनी मुस्कुराहटों के साथ मेरी रूह में सदा के लिए |
मुझे कोई शिकायत नहीं 
सदा की तरह मुझे मेरे खुदा
क्योकि तुम मुझे मुस्कुराते हुए ही अच्छे लगते हो ,
इसीलिए मुस्कुराते रहो ताकि 
में भी मुस्कुराते -मुस्कुराते जीती रहूँ |

आप के श्री चरणों में मेरे कोस्तुभ धारी
अनुभूति



सच से प्यार हैं |

"सत्यम शिवम् सुन्दरम "
मैं अपनी ही सांसों से पल -पल,
तुम्हारे सच के लिए लड़ती ही जा रही हूँ ,
कैसे कह दू की ऐ जिन्दगीं,
में तुझे भूली जा रही हूँ|
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |

जिन्दगी  और मौत से अब कोई सरोकार नहीं मुझे ,
लेकिन तेरे सच पे ,कोई और तो ठीक हैं मेरा मन भी इल्जाम दे  ये भी गवारा नहीं मुझे ,
मे तो हूँ उनमे से   लड़ती रहूंगी ,तेरे सच के लिए ,
तेरे शबदो के सत्य के लिए , तेरे विशवास के लिए ,
क्योकि मेने अब जाना मेरी जिन्दगी भी बनी हैं ये तेरी इबादत के लिए |
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शबदो के सच से प्यार हैं |

मेरी सांसे और तुम्हारे स्मृति पटल पे अंकित शब्द एक दुसरे से लड़ते हैं यूँ
सांसे कहती हैं छोड़ मुझे , वो झुटा हैं यूँ
और शब्द कहते हैं कही तो मजबूर हैं वो यूँ 
अगर मेरे खुदा झुटा हैं तू ,
तो मेरा तडपना , तेरे लिए जिन्दगी से भी बड़ी सजा होगी ,
क्योकि अब न दे सकेगा तू किसी के स्नेह को स्वार्थ और सहानुभूति का नाम ,
इससे बड़ी और क्या सजा होगी  तेरे लिए होगी|
 हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |

खेलता मैदान ऐ जंग में किसी दुश्मन से तो बात ही कुछ और होती ,
जो तुझे जान भी न पाया कभी उसके मासूम दिल से खेल जाना कँहा से बड़ी बात होगी  |
जिन्दगी भर ये  मेरी ये साँसे दुवाएं देंगी तुझे ,
ये ही मांगेगी वो अपने मालिक से की तुम जहा रहो बन के खुदा इस जँहा में जियों ,
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |


मेरी इस हाल  के जिम्मेदार तुम नहीं , 
वो हर लम्हा - लम्हा हैं जो इन सांसों ने साथ गुजरा हैं ,
वो हर आतम आनंद अनुभूति हैं जो आत्मा में बसी हैं ,
स्मृति पटल पे अंकित वो शब्दही हैं ,
हाँ जो मुझे आज भी ज़िंदा रखे हैं ,
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |



अनुभूति