मंगलवार, 17 मई 2011

Tumse Ho Jori - Rishi Nitya Pragya

तुमसे ओ जोड़ी ,तुमसे ओ जोड़ी ,तुमसे ओ जोड़ी 
साँची  प्रीत तुमसे जोड़ी ,
तुमसे ओ जोड़ी ,और संग तोड़ी  !
एक अद्भुत भजन मेरे कन्हा  का 
मेरे जीवन का पसंदीदा भजन 
अनुभूति 


जिन्दगी तेरे लिए !





दुनिया की भीड़  में जब में आती हूँ
.देखती हूँ कितने सारे सपने हैं सबके ,
 शिकायते हैं और न जाने ,
कितने ही ऐसे ख्वाब हैं,
जिनके पुरे होने का इन्तजार हैं उन्हें |
मेरे पास कहने को कुछ नहीं ,
किसी से शिकायत नहीं ,
कोई सपना नहीं चाहत भी नहीं
क्यों खामोश हूँ इस भीड़ में भी में ?
सोचती हूँ ज़िंदा क्यों हूँ ?
कुछ भी तो ऐसा नहीं
जिसे देख पाने की
मिल पाने की कोई उम्मीद भी बाकी हो
,फिर क्यों ढोएँ जा रही हूँ
इस बेजान जिस्म को
हार तो चुकी हूँ तेरी कायनात के आगे राम जी
घुटने टेक चुकी हूँ सब के आगे
स्वीकार कर चुकी हूँ वो सब कुछ जिसके लिए में  दोषी हूँ
और वो भी जिसके लिए कभी दोषी नहीं थी |
मान चुकी हूँ
में कमजोर हूँ दुनिया तेरे आगे
अब नहीं और लड़ सकुंगी में
"अनुभूति "

गिरवी पड़ी हैं,यादे भी


केसी खमोशी है चारो तरफ !
नींदे सुनी हैं! बाते खामोश  हैं !
सब तरफ की ,
ये ख़ामोशी  मेरी जान लेती हैं ,
मेरी   मेरे वचनों की तरह ,
जीने के सारे साहरे ,
  एक पल में यूँ ही छुट जायंगे  मुझसे सोचा नहीं था ,
   मेरे राम  जी !
मेरे ही साथ इतने.
 कठोर  भी हो सकते हैं |
 किसी से कह नहीं सकती
 अपनी इस ख़ामोशी को
की मेरे सारे एहसास
कल्पनाएँ भी गिरवी  हैं |
सब कुछ शून्य पडा हैं|
 दिल करता हैं वीराने में जाऊ ,
और जोर से अपनी आत्मा के द्वार खोल के रो लू
एक बार ही सही इतना रो लू की सारे आंसू सुख जाएँ |
सुख जाएँ आँखे की ये कभीअब सपनों की  छाया से भी डरे |
बहुत तकलीफ  होतीथी हर बार जब कोई सपना टूटा करता था |
लेकिन सपने दिखाने वाला,
 जब सपना छीन  ले,
 तो दर्द नहीं सिर्फ एक तीखी पीड़बची रह जाती हैं,
 हमेशा के लिए बस जैसे  पल -पल कोई ज़िंदा मुझे काट रहा हो |
आज तक समझ ही पायी गुनाह  क्या था मेरा ?
"अनुभूति "

वचनों का विशवास ,

  मन खिला हैं बसंती फूलों से
  तेरा विशवास मिलाहैं प्रभु मुझे ,
  जिन्दगी की आहट से ,
  मेरा ईश्वर ,
  मेरे राम! मेरी साँसों में हैं|
  वचनों का विशवास ,
  जिवंत हैं मुझमे और वचनों को निभाने की अटूट आस्था भी,
  मेरे राम बिलकुल आप ही की तरह |
  वचनों की डोर ही तो अब
  तपस्या रह गयी हैं जीवन की
  जो कुछ भी दिया हैं 
  अद्भुत दिया हैं
  आत्मा को प्रभु !
  संसार की हर बात मिथ्या हो सकती हैं 
  लेकिन मेरे  राम का नाम,और मेरे मस्तक का ये रक्त बिंदु
  कभी नहीं हो सकता |
  मेरे राम के हर शब्द में  झलकता हैं
  आत्मा का सच!
  मेरा अक्ष्णु विशवास,
  तो टूटा ही नहीं कभी वो तो सदा बंधा हैं,
  मेरी सांसो के साथ |
वो टूट जाता तो ?
  क्या करना हैं मिथ्या भ्रमों में जीकर 
  सब कुछ तो निराकार होकर मुझमे बसा हैं |
   "  अनुभूति "

 अपने राम जी की चिड़ियाँ