रविवार, 15 मई 2011

एक बार स्वार्थी बन जियो तुम !


कब मिलेगी  मुक्ति ?
तुम्हे पुरुष की वासनाओ से!
कब बाहर आकर देख सकोगी तुम 
आखिर कब तक तुम सहती ही रहोगी ,
कब तक इन्तजार करती रहोगी 
कभी तो एक दिन करना होगा सामना तुम्हे 
इस दुनिया का ,इस भीड़ का 
एक दिन तो तुम्हे करनी होगी 
इस संघर्ष की शुरुवात न ,
न की तुमने वासनाएं पूरी ,
तो कोई नहीं ढोयेगा  ये तन 
समझती क्यों नहीं ?
इस दुनिया में बदले में ही,
कुछ मिलने का रिवाज हैं
तुम्हारी आत्मा का कोई पर्याय नहीं यंहा
तुम लाख छलनी हो ,
तुम्हारा जिस्म जरुरी हैं ,
तुम्हारी सेवा के बदले 
पाल तो रहा हैं वो पुरुष तुम्हे
अब जिस दिन मन भर गया तुमसे
वो ले आयेगा एक खुबसूरत जिस्म
और एक बच्चे पैदा करने की मशीन 
ढो सकोगी ,ये सब साथ -साथ 
ये तुम्हारी दुनिया नहीं 
तुम तो शक्ति हो , अपने अंतस में झांको 
और देखो कितना कुछ छिपा पडा हैं यंहा
सामना करो खुद का ,
एक बार स्वार्थी बन जियो तुम
हां अपने लिए !
"अनुभूति "



ये ही तो शक्ति हैं |

हमेशा की ये रीत रही हैं 
हर फैसला ,
पुरुष ही करता आया हैं ,
और एक नारी,
उसे सदा स्वीकारती ही आई हैं 
कभी कोई खिलाफत नहीं,
मौन सर को झुकाकर ,
सब सह लेना 
ये ही तो शक्ति हैं |
पुरुष कँहा कभी
स्वीकार कर सका हैं,
अपने स्नेह को भी खुल के
कितना भी बड़ा कोई पुरुष क्यों न हो
वो सदा भागता ही रहा हैं
अपनी स्नेह स्वीकारोक्ति से
फिर भी एक नारी नहीं छोड़ सकती हैं सदा 
अपनी आत्मा से उसका साथ 
क्योकि वो कायर नहीं
सदा शक्ति बन पुरुष के आगे खड़ी हो देती हैं
उसका साथ |
सदियों से ये ही परिभाषा सुनती आई हूँ 
चाहे सीता हो या राधा 
हँस के मिटने का नाम ही शक्ति हैं 
नारी  कमजोर नहीं तुम्हारी तरह पुरुष
जो एक वचन दे ,छोड़ जाएँ 
तुम्हरा साथ
 जब सात जन्मो के लिए ,
एक जनम में ही वचन दे सकती हैं
तो क्या एक वचन के लिए 
एक जनम भी नहीं निभा सकती
क्या समझते आये हो ?
पुरुष तुम उसे !
हाड - मांस का एक खिलोना 
जिसके मन के द्वार जब चाहे खुलवा लिए ,
जब चाहा तन खोल दिया 
जब चाह आत्मा बिंध दी 
मत समझो इतना भी कमजोर
जिस दिन शक्ति अपने रूप में आई 
तुम कर न सकोगे अपना सामना खुद
ये तुम्हारी आत्मा भी जानती हैं  ओ पुरुष !
इसीलिए ही शायद शिव को शक्ति का क्रोध शांत  करने
लेटना पडा था उसी शक्ति के कदमो में|

अनुभूति

तेरे नाम का विष प्याला

ओ कान्हा , 
कृतार्थ कर दिया आप ने ,
स्वीकार मेरी भक्ति की अपने चरणों में ,
मुझे आज ये विष प्याला,
तेरे नाम मिला हैं ,तेरे नाम का विष प्याला
मुस्कुरा के में पी जाऊं,
ये जो सम्मान मिला हैं ,
कभी कंहा इनकार किया हैं तेरी किसी बात से कान्हा !
तेरे चरणों में शीश झुका के सब स्वीकार किया हैं
तेरी मीरा  का निष्काशन भी इसके बाद  हुआ था 
जीवन में भक्ति का अब तो मार्ग खुला हैं,
जो सबसे प्यारा होए तो उसे छोड़ दीजो 
सबसे बड़ा त्याग ये कर दीजो
एक बंधन था मोह का जो आत्मा से बंधा  था
वो आज छुट गया अब तो उजाला ही उजाला हैं
कोई भ्रम नहीं सामने एक जीव से मोह था
वो अभी छुटा पडा हैं 
पर परायों ने अपना होकर ये काम किया हैं
वो तो जानते ही नहीं उन्होंने मेरे मार्ग आसान किया हैं
नतमस्तक हूँ उनके आगे जिन्होंने ये काम किया हैं
सच खुशियाँ देने आये थे , दे गए उन्हें पता भी नहीं हैं
मेरे आँचल को भर
उन्होंने अपनी सहानुभूति में जो काम किया हैं
अद्भुत ,अनुपम सौगात के लिए धन्य हूँ प्रभु !
ये भी जीवन  नया रूप दिया हैं
में जानू विष भी आप अमृत भी आप
आदि भी आप अनंत भी आप
कब कोनसा रूप धर मार्ग दिखोगे ?
कब आओगे ?कब  चले जाओगे ?
तेरी ही माया  हैं मेरी श्री हरी !
मेरे नारायण !
अभिभूत हूँ तेरी कृपा  पाके 
मेरे गिरिधर! 
मेरे गोपाल !
पग -पग थाम जटिल समय आप ने ही मृत्यु
से थाम जीवन का मार्ग दिया था
आज जीवन को नया सोभाग्य और पवित्रता
का सम्मान दिया हैं ,
मेने अपना जीवन कान्हा नाम अर्पण किया हैं 
जिसका हैं वो जाने अब
मेरे सोचने, कहने ,करने का
क्या काम लिखा हैं |
शब्द दिए आप ने मांगे भी आपने प्रभु !
तेरा तुझको अर्पण !
मेरे जगदीश्वर! आप ने इस तुच्छ पे,
ये कृपा कर इस जीवन को पवित्र धाम किया हैं |
इस लोक से उस लोक सदा आशिशोगे
इससे बड़ा क्या सुख सामान पाऊं में
बिन मांगे सब दिया हैं |
धन्य हूँ !
में जगदीश्वर !
मेरे कान्हा !
बस हर पग दे ठोकर , 
हर पग अन्दर से थाम मुझे बदाएं चलना
बाकी हैं अभी बहुत जीवन के काम ,
चुकाने रह गए हैं कितने अहसान
प्रभु ! 
मिटा के तेरी भक्ति में चुका सकू  सभी
अहसान , सहानुभूति ये और वरदान दीजो |
इस पगली की भक्ति मेरे कान्हा  सदा स्वीकार कीजो |
"तेरी बावरी अनुभूति कान्हा "
 मेने अपने जीवन में अपनी हर सांस से स्नेह अपने आराध्य श्रीराम,श्रीकृष्ण , श्रीहरी को किया हैं मेरी आत्मा का रोम -रोम मेरा हर शब्द किसी इंसान के नहीं उस जगदीश्वर के प्रति समर्पित हैं |




कृष्ण -प्रेम,



मेरे कान्हा 
प्रियतम का मन अधीर ,
तन - मन व्याकुल 
 प्रथम मिलन का
ये आलिंगन  केसा होगा? सोच
धड़क उठे राधा दीवानी मूंदे नयन
उत व्याकुल श्याम कहे न मन की पीड
स्नेह झलके आँखों से ,
कोई कहे न मन की पीर 
एक मन जाने दूजे मन की थाह 
केसे कह दे सब आके करीब ?
मर जायेगीं राधा , शर्म से
जो कान्हा तुमने उठा लिया ,
ये घुंघट इस चाँद से
रह  न सकोगे , 
सह न सकोगे
इस चांदनी की ये पीर ,
अधरों से अधरों को मिल 
मिट जाने दो अब ये जन्मो की पीड|
अनुभूति

मेरी हर कविता मेरे भगवान श्री कृष्ण और और उनकी राधिका के चरणों में समर्पित हैं |