रविवार, 8 मई 2011

कँहा पुकारू !

कँहा पुकारू ?
जाने कँहा से आये ,
और न जाने कँहा खोगये,
इस दुनिया की भीड़ में ,
इस सुने जीवन को भर दिया स्वप्नों से 
दिखा राह न जाने खो गये 
कँहा खोजू ,कित जाऊ 
किसको कहू अब मन की पीड 
जब जरुरत हैं विपदा में खो गए कँहा 
किस से पुछु जीवन पथ नवीन 
कँहा जाउंगी में इस दुनिया में
घबरा उठी हूँ .
किस राह निकलू ?
अब न सह सकुंगी 
कोई अपमान नवीन .
कहे मन कूद गंगा में पा जाऊं 
सारे संतापों से अंत .
जाते -जाते ले गए आप तो 
मेरे प्राण भी अधीन .
कोई द्वार मुझे नहीं दिखता 
न कोई संगी साथी .
पुकारू कान्हा तो,
वो  भी हो गया मौन ,
साथ नहीं मुझको कोई राह दिखा जाओ ,
समझ नहीं रहा कुछ भी
मेरे मालिक
कही तो कोई रौशनी की किरण दिखा जाओ |

अनुभूति

आशीष का उजाला

 ओ मेरे राम जी ,फैला तुम्हारे ,स्नेह,
और आशीष का उजाला चारो और , 
अब कोई अन्धकार कँहा मुझे डराएगा |
पार कर चुकी हूँ सारे सागर मोह ,माया के 
तेरे चरणों में जो अपने को अर्पण कर बेठी हूँ |
सारे मिथ्या भ्रम हैं जीवन के जानने लगी हूँ सब ,
सब कुछ झूठा 
,एक साचा तेरा नाम
मेरे राम!,राम! ,राम !
मेरी तपस्या से जो आत्मा तुम्हारी हो शांत , प्रसन्न ,
तो बना लू पूरा जीवन ही में तेरे तपस्या के अधीन |
इस मस्तक पे लगे रक्त बिंदु की तरह 
मेरी आत्मा  सदा तेरे अधीन | 
पहले तुम दिखाते रहे राह जीवन की नित नवीन
जीवन के रणक्षेत्र में उतरना ही होगा अब प्रभु 
लेकर तेरा स्नेह ,आशीष अधीन |
तुम तो अंतरयामी पहले से ,
पड़  लेते हो आने वाला जीवन पथ नवीन 
अब कँहा कोई अन्धेरा मुझे रोक पायेगा 
जिसे  मिला स्वयं हो अंखड होने का वरदान
मुझे मिला हैं उसी प्रभु का स्नेह ,आशीष ,असीम |
अब तो उजाले जीवन की राह बुहारेंगे
डर  नहीं कुछ बाकी अब कुछ खोने का
पास कुछ नहीं तो तो डर सब मिट जायेंगे 
एक आशीष , एक वचन और जीवन समर्पण
ही बस मुझे याद रह जायेंगे |
 ओ मेरे राम जी!
फेला तुम्हारे ,स्नेह,
और आशीष का उजाला चारो और , 
अब कोई अन्धकार कँहा मुझे डराएगा |
हमेशा लगे चिंता करे मेरे प्रभु मेरी
मुझे जान अबोध ,अनाथ 
दास अधीन |
ये कृपा संसार तुम्हरा क्या कम हैं प्रभु !
जो उस लोक से इस लोक में भी देते रहते हो अपनी आत्मा 
से स्नेह आशीष, असीम |
पा तुम्हारी सरलता , 
कृतज्ञता में जीवन कर बेठी तुम्हारे चरणों के अधीन |
जिस के पास खोने को कुछ नहीं, 
डर उसे इस संसार में किसका नवीन |
इन अँधेरे को मिटा दो,
अपनी आत्मा से अब प्रभु अपने
नहीं अकेली में अब , 
जो संग हैं आत्मा के तुम्हारे आशीष नवीन |
में शक्ति हूँ!
ये एहसास तुमने दिया हैं मेरे प्रभु !
शक्ति कँहा किसी के अधीन रही हैं हैं प्रभु !
वो तो सदा शिव के आगे खड़ी हैं बन के ढाल .
केसे कह दू अब की,
की कोई अन्धेरा तुम्हरे आशीष रहते
डस  जाएगा |
प्रभु रखो यकीन ,
अंधेरो से निकल कर ये सूरज एक दिन चमक जायेगा |
न चमका तो तेरा स्नेह विशवास ,अधूरा जाएगा |
न कभी मेरे रहे ये हो सकता हैं |
न हो पायेगा |
तेरा आशीष एक दिन जरुर अपना अस्तित्व पायेगा |
मेरे राम !
मेरी आत्मा को मिला  हैं
तेरे तेज का  अंश , अपने आशीष में
फिर कँहा कोई इन आँखों का सामना कर पायेगा |
केसा भी हो अब जीवन पथ 
हँसते - हँसते कट जाएगा |
अब कोई शोक ,चिंता नहीं मेरी प्रभु !
तुम्हारी इस मूरत पे अब मुस्कुराता चेहरा 
ही मुझे शक्ति दे पायेगा !
इससे ज्यादा आस नहीं इस बंधिनी की 
तुमसे मेरे राम !
"तुम्हारे श्री चरणों में अनुभूति "
 का प्रणाम करो  स्वीकार ओ मेरे राम !
अनन्य कोटि -कोटि करती हूँ 
मेरे प्रभु !
इन अश्रु धाराओं से तुम्हरे चरण धोकर प्रणाम |

"अनुभूति "



































































करुणा के सागर

हे करुणा निधे !
करुणा के सागर कभी तो,
कोई बूंद अपने दुलार की ,
मेरे नाम भी लिख !
क्या चाहता हैं प्रभु मुझसे !
केसी बंदगी ?
कन्हिया !
"तू ही तो कहता हैं,
कर्म करना ही तेरा अधिकार हैं 
फल में नहीं "!
मुझे आना ही होगा जीवन के  रणक्षेत्र में 
सारे मन के बन्धनों को तोड़ ,
में मुर्ख उनसे बांधू स्नेह की डोर
जो साथ रह के भी घोप रहे मेरे ही दिल में खंजर |
प्रभु !
बस क्या इमानदारी  की सजा ये  ही हैं |
कभी तो कर दो अपने दुलार की कोई बूंद 
मेरे  नाम |
ये कोनसी  नयी परीक्षा हैं तेरी दयानिधे  !
क्या चाहता हैं प्रभु मुझसे ?
में निकली तेरे रणक्षेत्र में तो दुनिया बहुत पीछे छुट जायेगी 
और इस दुनिया की भीड़ में भी बन जाउंगी 
सिर्फ अपने लिए जीने वाली 
स्वार्थी !

अनुभूति