शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

ऐ खुदा कभी तो कोई मेरी दुआ कबूल कर ले ।

एक सवाल हूँ में तुम्हारे लिए
सिर्फ एक दर्द का एहसास ही तो हूँ में
जो छुजाता हैं तुम्हे अंतस तक
में एक इंसान हूँ
जो बेरंग हैं तेरे बिना
दुआ हैं ये जिंदगी या कोई सजा मुझे नहीं पता
इतना पता हर लम्हा तेरे नाम हैं जिंदगी
काश कभी कायनात मुझपे मेहरबान हो
और अपनी बाहों को खोले तुम मुझेसे
एक बार अपने लबो से एक बार
कहो चली आओ !

चली आउंगी
में सारी दुनिया की रस्मो को छोड़े
मेरा पास कुछ नहीं खोने को
और सच कहू तो पाने को भी नहीं
फिर भी ये मासूम मन बच्चो सी बाते किया करता हैं
अपने ही सपनो का जहां बसाया करता हैं

सत्य के धरातल पे में एक खाब ही हूँ
केसे कहू तुमसे की हर पल तिल -तिल
तुम्हारी चाह में ,विशवास पे जीता एक इंसान हूँ में
हां एक इंसान हूँ में
कोई शब्द ,कविता या गजल नहीं
धड़कते दिल का एक पैगाम हूँ में तुम्हारे लिए
पुकारते -पुकारते

तुमने तो अपने होठो को न खोलने की कसम
अपने आप से ही खा रखी हैं
पता नहीं कोनसे जनम की बाकी सजा मेरे नाम की हैं

जिंदगी कब तक यूँ ही चलती रहेगी
नहीं मालुम पर ये भी मेरी ही तरह झपकती -बुझती रहेगी
ऐ खुदा ऐसी तो कोई सुबह अब कर दे
जब इन साँसों की महरबानी इस जिस्म के नाम न हो
ऐ खुदा कभी तो कोई मेरी दुआ
कबूल कर ले ।
आमीन !आमीन! आमीन!


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