गुरुवार, 7 जुलाई 2011

सुख का ये अमृत

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे गोविन्द !
मेरे रोम -रोम में बसे माधव !
ये बावरी तुहारी हैं भाव विभोर
नतमस्तक हूँ तुहारे चरणों में
जो सुख पाए मेरी आत्मा वो क्या कहू !
इतना जानू सदा
 में पाऊं अपने को रोते तेरे कदमो में
रोऊ नहीं में दुःख से
हे कृपा निधान !
जगदीश्वर !
ये तो मेरी आत्मा से गिरती मन की गंगा हैं
जो बूंद -बूंद गिरती जाए तुहारे चरणों पे ,
सुख का ये अमृत
कान्हा !
केसे कहूँ ?
जेसे पायस हो
तेरे अनन्य स्नेह का
मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति

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