मंगलवार, 17 मई 2011

वचनों का विशवास ,

  मन खिला हैं बसंती फूलों से
  तेरा विशवास मिलाहैं प्रभु मुझे ,
  जिन्दगी की आहट से ,
  मेरा ईश्वर ,
  मेरे राम! मेरी साँसों में हैं|
  वचनों का विशवास ,
  जिवंत हैं मुझमे और वचनों को निभाने की अटूट आस्था भी,
  मेरे राम बिलकुल आप ही की तरह |
  वचनों की डोर ही तो अब
  तपस्या रह गयी हैं जीवन की
  जो कुछ भी दिया हैं 
  अद्भुत दिया हैं
  आत्मा को प्रभु !
  संसार की हर बात मिथ्या हो सकती हैं 
  लेकिन मेरे  राम का नाम,और मेरे मस्तक का ये रक्त बिंदु
  कभी नहीं हो सकता |
  मेरे राम के हर शब्द में  झलकता हैं
  आत्मा का सच!
  मेरा अक्ष्णु विशवास,
  तो टूटा ही नहीं कभी वो तो सदा बंधा हैं,
  मेरी सांसो के साथ |
वो टूट जाता तो ?
  क्या करना हैं मिथ्या भ्रमों में जीकर 
  सब कुछ तो निराकार होकर मुझमे बसा हैं |
   "  अनुभूति "

 अपने राम जी की चिड़ियाँ 

कोई टिप्पणी नहीं: