बुधवार, 20 अप्रैल 2011

में लिखना चाहती हूँ कवितायेँ तुम्हें

मेरे प्रभु!
में लिखना चाहती हूँ कवितायेँ तुम्हें ,
तुम्हारे श्री चरणों में 
अर्पित कर देना चाहती हूँ ,
मेरे सारे शब्द ,
मेरी सारी भावनाएं ,
मेरी मुस्कुराहटें   
मेरा स्नेह ,
मेरी खुशियाँ ,
मेरा प्रेम तुम्हारी ही भक्ति हैं ,
 पल -पल जो इन होठो को जो मुस्कुराहट देते हो ,
वो भी तुम्हारी ही शक्ति हैं ,
कितना आलोकिक स्नेह हैं तुम्हारा
मेरे प्रभु ,
में मुग्ध हूँ तुम्हारे 
असीम स्नेह पे ,
अटल साथ पे ,
तुम्हारी सरलता पे ,
तुम्हारे इन नैनों की सजलता पे ,
तुम्हारी इस अनंत स्नेहमयी मुस्कुराहट पे ,
आलोकिक वाणी पे ,
जो तुम्हारे ध्यान में आते ही ,
आदेश बन कर गूंज उठती हैं ,
और में दुनिया से बेखोफ होकर निकल पड़ती हूँ ,
 इस असीम ,ध्यान और आध्यात्म के महासागर में ,
बस मुझे अपने श्री चरणों से  यूँ ही लगायें रखना ,
और मेरी आत्मा में बसकर ,
मेरे तन - मन को 
मेरे शब्दों  को 
मेरे एहसासों को ,
यूँ ही सीचतें रहना , 
और मुझे देना अपनी पूर्णता ,
अपने नारी होने का अस्तित्व 
माँ होने की शक्ति ,
क्योकि में बहुत कमजोर हूँ 
तुम्हारे इस आगाध स्नेह के बिना ,
मेरी भक्ति का कोई अस्तित्व ही नहीं 
इसीलिए इतनी ही सरलता से बसे रहना
मेरी आत्मा में ,
मुझमे ,
और खिलखिलाती मेरी इन मुस्कुराहटों में
क्योकि मुझे ज्ञान नहीं दुनिया की तरह तुम्हारे विराट रूप का |
में तो तुम्हे बस अपना मान,
जीवनसे  हार चुकी हूँ प्रभु !
स्वीकार करो मेरी ये प्रार्थना और अब मुझे
मेरी वेदनाओ से मुक्त कर,
इस सरिता को दो अपने सागर में मिलने की समर्थता ,
मेरा मार्ग भी तुम ही हो ,
और अंत भी तुम ही प्रभु!
अर्पण कर चुकी हूँ अपना सर्वस्व 
प्रभु !
तुम्हारे इन श्री चरणों में |
तुम्हारी अनुभूति

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