शनिवार, 16 जनवरी 2010

कसूर

घुटती हुई एक लड़की ने हाथ ही तो बढाया था तुम्हारी तरफ विशवास का
अनोखे थे ,सितारे तुम्हारे शायद ये सोचकर
लेकिन तुम कभी समझ ही नहीं सके उसके मन की गहराई
और तुमने तोल दिया वासना और धन की चाहत से ,
आत्मा की गहराई को ,
शायद एक नादान कर बैठी थी
तुम पे विशवास करने की खता
सोचा था तुम भीड़ से जुदा हो ,गहरे हो तुम
पर तुम तो मुझसे भी कमजोर थे
हां कसूर क्या था उसका ?जिसने पूज लिया था तुमको ,उसका ?
क्या श्रद्धा ,समर्पण और विशवास का यही सिला है ?
अगर है तो ये मेरा कसूर है के एक नादान बड़ा बैठी विशवास का हाथ तुम्हारे साथ
अपनी ही निगाहों मै छोटे साबित कर दिए है तुमने श्रद्धा औरनिस्वार्थ स्नेह जैसे शब्द
एक पल मै झुका दिया है फरिश्तो के सामने मेरा मस्तक
किनसे शर्मिन्दा हु ,सोच रही हु तुम से ,या अपने आप से
शायद यही कसूर था उस नादान लड़की का जो बड़ा बैठी तुम्हारी तरफ विशवास का हाथ
कभी ना सिख पाने वाला पाठ पड़ा दिया तुमने उस नादान लड़की को
हां ये ही था कसूर उसका ,की उसने तुमको खुदा माना |

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