गुरुवार, 26 मई 2011

ये ही मेरा जीवन तप हैं !


कान्हा जी!
तेरे स्नेह के आगे नतमस्तक हूँ|
कितना स्नेह जीवन में भर दिया हैं !
एक सपना अधूरा था,
आप ने अपने होठों को ,
अपनी बांसुरी से लगा के पूरा कर दिया हैं |
तेरी मधुर मुरली मेरी साँसों में जीवन रस घोले ,
जितनी बार बंद करू आँखों को
मेरा कोस्तुभधारी मुझे पुकारे ,
तेरे मन में होगी पीड़ा में कँहा समझ सकू !
मुर्ख , अज्ञानी ,नादान
में तो सदा से ही करती रही अपनी ही वाणी ,
मेने नहीं तेरी निस्वार्थ स्नेह की कदर जानी ,
मेरे कान्हा ,
अब तो में तेरी दीवानी भी नहीं ,
बन गयी हूँ चरणों की दासी बस !
मेरा तप , तेरी भक्ति ही ,
जीवन आरधना मेरी
बसी रहे तेरी मुरली की मधुर वाणी
मेरे जीवन में बस !
ये ही मेरा जीवन तप हैं ,
मेरे कोस्तुभ धारी !

अनुभूति

स्नेह की चांदनी .

ओ कान्हा ,
तेरे अनन्य अनुराग की चांदनी छाई हैं ,
राधा के मुख पे .
तेरी मुरली की मधुर तान से ,
हर तरफ गीत गा उठा हैं मौसम ,
गोपियन संग राधा ,बार - बार,
अंखियन में काजल लगा देख रही दर्पण ,
कभी ये पायल पहने कभी वो ,
खनकती राधा यूँ
देख - देख राधा, गोपियन से ही लजाएँ
सुन तेरी मुरली की धुन ,
बस नहीं खुद पे
सारे सिंगार छोड़ चली आई
दोडी आई युमना तट पे .
श्याम तो दीवाना राधा के मन का ,
किस रूप से वो मोह बंधन में बंधे ,
रूप नहीं ,रंग नहीं
कन्हियाँ तो चाहे स्नेह की चांदनी .

अनुभूति


बुधवार, 25 मई 2011

मेरे मुरलीवाले !

मेरे कान्हा!
मेरे मुरलीवाले !
हर दर्द में सह लू ,
हर वेदना में हँस के पी जाऊं ,
पर तेरे चेहरे की कोई सिलवट,
देख न जी पाऊं |
तेरे इन अधरों पे ,
खेलती मुस्कान ही मुझे प्यारी लागे |
मेरे गिरिधर !
तेरी बंसी की धुन की में दीवानी 
पर तेरी धुन में छिपी आह मुझसे सही न जाएँ |
अपनी बंसी की धुन पे
गीत ऐसा सुनाओ मेरे गिरिधर की 
जिन्दगी  झूम उठे ,
और में तेरे कदमो की बंदगी करते-करते
तुझमे ही विलीन हो जाऊं |
उदास हैं जिन्दगी ,
जीवन का कोई राग छेड़ दो कान्हा !
जी जाएँ तुम्हारी मीरा ,
गा उठे राधा रानी ,
रुक जाएँ इन अखियन से बहते नीर 
आज मुरली की ऐसी मधुर तान छेड़ दो ,
कभी रास रचाया था ,
जो तुमने अपनी राधा संग 
आज वो फाग छेड़ दो |
अनुभूति

मेरे निराकार जगत के स्वामी !

प्रभु!
मेरे कन्हियाँ !

में मुर्ख ,अज्ञानी ,करती रही 
सदा तुम्हारे साकार रूप की भक्ति ,
मेरी आत्मा में बस गया तेरा ,
"बंसी अधर रखे रूप सलोना  "
कितना तडपी  हैं मेरे आत्मा ,
तेरे अधरों की बंसी की आह से ,
तेरे साकार रूप की तपस्या के में लायक नहीं ,
इस रूप में वेदना ही मेरे नाम लिखी हैं प्रभु !
शायद  ये ही मेरी अनन्य भक्ति का पुरस्कार हो .

दिल करता हैं आज,
अपने दोनों हाथो की नसों को  काट ,
बह जाने दू सारा रक्त इन शिराओं से ,
ताकि तुम आजाद हो सको मेरी रूह से,
और में खो जाऊं अपने यथार्थ सत्य में , 
हां अपनी मृत्यु की बाहों में सुकून से .


लेकिन फिर भी डरती हूँ ,वंहा भी तेरे पास आई ,
तो तुम कहोगे"अनु" तुम यंहा कँहा से चली आई ,
तुम्हारी अभी और सजा बाकी हैं ,
जाओ एक जनम और लो और बाकी की पीड़ा भी सहो ,
ये सोचकर ही हाथ मेरे थम जाते हैं |

और में तुम्हारे कदमो में बैठ कह उठती हूँ
मेरे कन्हाई !
अभी जो सजा बाकी हैं सब दे दो ,
चाहो तो मुझे,
भीष्म की तरह हजारों बाणों की नोक से छलनी कर दो
मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता ,
मुझे दर्द नहीं होता ,
वो दर्द भी मेरे आगे हार गया हैं प्रभु !
ये प्राण तुम्हारी आज्ञा के बगैर नहीं निकलेंगे ,
मेरे कोस्तुभ के स्वामी !

भीष्म की मुक्ति के दिन भी तुम सामने खड़े थे न ,
मेरी मुक्ति के दिन भी आओगे ना !
तुमको आना होगा मेरे माधव!
उस दिन तो मेरे लिए ,
आओगे न !

बस इन आँखों से बहता ये नेह नीर ,
तुम्हे पुकारे मेरे निरकार माधव !
अब मुक्ति दे भी दो |
अब बस रहम कर भी दो |

मेरे माधव !
दे मुक्ति मेरी यातनाओं का अंत का भी दो .
मेरे नारायण !
मेरे निराकार जगत के स्वामी !
उस लोक के वासी कभी तो अपना क्षीर सागर छोड़ मेरी भी पुकार सुन लो |
  

अनुभूति




एक भेट मेरे मित्र को सालो बाद अपने घर अपना बेटा होने की ख़ुशी में ,

एक भेट मेरे मित्र को सालो बाद अपने घर अपना बेटा होने की ख़ुशी में ,
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
मेरे मित्र ,
मेरे पास दुवाओं के सिवा ,
कुछ भी नहीं तुम्हे देने को ,
जानती हूँ सालो की इस वेदना को भोगा हैं ,
तुम्हारी पत्नी ने ,तुमने ,
मेने कँहा था तुमसे की ईश्वर जो भी देता हैं अपनी मर्जी से,
वो बहुत खुबसूरत और मासूम होता हैं |
और तुम लड़ते रहे मेरे ईश्वर से हमेशा .

वो बहुत कठिन  परीक्षाएं लेता हैं ,
खुशनसीब हो जल्दी सफल होगये .
तुम उसकी परीक्षाओं में तुम .
ईश्वर इसी खूबसूरती से सदा तुम्हरा जीवन भरा रखे |
बस कभी अपने विशवास को यूँ हिलने नहीं देना ,
क्योकि अभी तो जीवन की बहुत परीक्षाएं  बाकी हैं मेरे मित्र !
मेरी उस मासूम बहन को बहुत स्नेह देना |
 तुम्हारे चाँद की सारी बलाएँ में अपने सर लेती हूँ | 
सदा यूँ ही खुश रहो ,अपने अनुराग को यूँ ही सहेजते रहो .
,मुस्कराते रहो फूलो की तरह

अनुभूति

केसे पुकारू तुम्हे ?

मेरे कन्हियाँ!
केसे पुकारू तुम्हे ?
जितना रोम -रोम मुझमे बसे थे तुम ,
बूंद -बूंद इन अखियन से ,
निकलकर बहे जाते हो ,
केसे कहू तुम्हे की,
किस  तरह तुम्हे!
मेरे तन , मन से निकाला गया हैं |
मुझे इस दुनिया के पुरुष ने ,
अपनी अधीनता का एहसास दिलाया हैं |
बह जाओ अब जीवन से ,बह जाओ |
तुम ने तो मुझे कब का भुला दिया था कान्हा!
में ही बांधे बेठी थी तन ,मन की ये डोर '
और तुमने मुझेकिसी न किसी रूप में आकर मुझे झकोर के 
अपने साथ न होने का एहसास दिला ही दिया हैं |
नहीं पुकारूंगी कभी तुम्हे , कभी नहीं |
बह जाओ जितना बह सकते हो मेरे रोम -रोम से 
जिस्म -को जिस्म ही रह जाने दो ,
ये दुनिया ये ही चाहती हैं |
मेरे चाहने न चाहने से कभी कुछ  हुआहैं क्या ?
इसीलिए कभी कुछ बदेलगा ,
ये सोच के ही में लागती रही
तेरे कदमो में गुहार ,
और तुमने 
मेरे स्नेह को परिभाषित कर दिया 
सहानुभूतियों में ,
केसे पुकारू तुम्हे अब ?
बह जाओ जितना बह सकते हो !



अनुभूति

मंगलवार, 24 मई 2011

मेरे श्रीहरी

इस संसार से परे,
जिस दुनिया में बसे हो
मेरे श्रीहरी  !
मेरे ईश्वरतुझे पुकारती हैं,

मेरी विदीर्ण आत्मा ,
कँहा हैं प्रभु !अब तो सुन , 
कभी तो इस धरती पे आके भी देख
में पुकार सकती हूँ तुम्हे केवल ,
नहीं बैठ  सकती तेरी साधना में ,
नहीं कर सकती कोई आरधना.
येआत्मा
में नहीं चढ़ा सकी में 
अपनी आत्मा का ये,
मलिन पुष्प तेरे चरणों में 
कितना कुछ सहेज रखा था मेने 
तेरी साधना के साथ ,
इस जीवन को तपोवन बना की थी,
मेने तेरी भक्ति 
ईश्वर तुने एक ही पल में ,
मुझसे छीन लिया मेरा सब कुछ ,
मेरे राम में सीता नहीं थी ,
कभी में तो अहिल्या भी न बन सकी ,
केसे में कर सकुंगी  सामना खुद का ,
किस गंगाजल से धो के कर सकुंगी 
अपने को पवित्र ,
इस जनम में कभी नहीं अब |
आसुंओं से धुल जाता तो में धो भी लेती 
ये नहीं धुल सकता कभी किस अमृत से भी अब .
अनुभूति 


दमन

तुम्हारी वो क्रूर बड़ी -बड़ी आँखे घुर रही थी उसे ,
समझ ही नहीं पायी वो तुम्हरा अंदेशा ,
कितनी भूख सिमटी हैं पुरुष
तुम्हारे अंतस में तन की ,
कितनी ही रातों तुमने किया हैं'
पत्नी के साथ भी बलात्कार ,
और दिन  में किया हैं
उसकी भावनाओं का दमन 
तुमने उसके मासूम हृदय पर कभी नहीं रखा ,
अपने स्नेह का हाथ ,
अपने स्वार्थ के लिए ,
सदा तुम खेलते रहे उसकी भावनाओं से ,
और बदले में दे दिया करते हो सहानुभूतियों का नाम ,
स्नेह के बदले भी तुम सहानुभूति उसके नाम करते हो ,
और अपनी आत्मा के सत्य से छिपाकर,
ये तोहमत उसके नाम करते हो ,
तन ,मन आत्मा हार चुकी होती हैं जब ,
एक पल में तब झटक लिया करते हो अपना दामन ,
हर फेसला तो तुम ही करते हो ,
उसका जिस्म ही सबसे बड़ी खूबसूरती  होता हैं न पुरुष !
तुम्हारे लिए .
 क्यों नहीं सालों साथ रहने के बाद भी,
झाँक नहीं पाते उसकी आत्मा में ?
तन तक ही क्यों सिमटी रह जाती हैं तुम्हारी भूख !
और छोड़ जाते हो उसकी देह पर अपनी वासनाओं के निशान,
निशान तो समय मिटा देता हैं ,
लेकिन आत्मा पे लगे जख्म,
सहानुभूति बन कर हमेशा हरे रहते हैं |
"अनुभूति "

ईश्वर की सबसे अनुपम कृति

"नारी ईश्वर की सबसे अनुपम कृति हैं |"
शायद किसी पुरुष ने ही लिखा होगा ,
और इस अनुपम कृति का सबसे ज्यादा ,
तिरस्कार , उपभोग और दुर्दशा भी उसी पुरुष ने की हैं |

ईश्वर तुमने तो बनाया उसे स्नेह ,समर्पण 
और त्याग की मूरत ,
तुमने एक मिटटी की गुड़ियाँ को बना
कर उसमे डाल दिए ,
इतने सारे गुणों के प्राण ,और खड़ा कर दिया 
संवेदहीन पुरषों के बीच 
,कभी माँ ,कभी बेटी कभी पत्नी ,
और कभी प्रेयसी बनाकर ,
तुमको थोड़ी भी दया नहीं आई ईश्वर!
तुमने पुरुष की सारी कमजोरियों का जिम्मेदार ,
उसे ही बना दिया सदा एक पल में ,

तुम ही ने तो एक पल में कहलवाया 
"नारी तुम श्रद्धा हो |"
और एक तरफ त्रिया चरित्र का कलंक ,

कोई भी उस माटी की गुड़ियाँ के अंतस में उतरकर
समझ पाया उसकी मासूमियत को ,
उसकी नाजुक सी अन्दर ही अन्दर दम तोडती मुस्कुराहट को |

अनुभूति

सोमवार, 23 मई 2011

मेरे ठाकुर जी

मेरे कन्हियाँ !
बूंद -बूंद बरसे इन अखियन से
आलौकिक स्नेह तुम्हारा ,
तुमने कहा पुकारना मुझे,
जब भी आत्मा पुकारे ,
तुम सदा चले आये ,
अपने वचन निभाते ,
सदा लाज रखी,
मेरी आत्मा के अक्ष्णु विशवास की ,


मेरी वेदनाओं को पी लिया अपनी आत्मा से .
हमेशा दिया हैं मेरी आत्मा का साथ ,
मेरे प्रभु ,
इन अखियन से गिरता स्नेह नीर ,
सदा पग पखारता आप के ,


मेरे मुरलीवाले
मेरे कन्हियाँ !
मेरे बासूरी वाले !
मेरे ठाकुर जी !


आप के श्री चरणों की दासी
अनुभूति

मुरली की धुन

ओ, मेरे कान्हा!
सूना पडा हैं, तुम बिन, ये बृजका संसार
मिलो दूर तक नहीं ,
तुम्हारे मधुर अधरों की मुरली की धुन
पूछे तुम से हर गोपी,
काहे छोड़े गए हो ये बृज  का संसार ,
सूना पडा हैं तुम बिन गोकुल का संसार ,
जिस घटा में तुम संग रास रचाया ,
वो घटा बरसे भी तो तन - मन को चुभती हैं |
ओ कान्हा ,
गोवर्धन , गिरीवर धारी ,
हर क्षण तुहारी मुरली की मधुर तान आत्मा ढूढती हैं ,
एक बार आ जाओ ,
कित हो ,कँहा हो ,केसे हो कान्हा!
कुछ नहीं जाने ये गोपियन ,
ये तो जाने तुम्हारी मुरली की मधुर धुन ,
एक मधुर तान इस ह्रदय को भी सूना जाओ ,
तुम्हारे अधरों की उस मीठी बासुरी की वाणी को  
मन कही खोज रहा  ,
आजो एक मधुर गीत ,
इन गोपियन को भी सूना जाओ |
इन गोपियों की आँखों से आंसुओं को,
अब मोती बना जाओ ,
काहे रूठे हो कन्हियाँ !
उनसे रूठे ही रूठे हो ,
जो सुनके ही खुश हैं तुहारी मुरली की धुन |
छेड़ दो आज अपने अधरों से कोई मधुर धुन 
कर दो इस बैचेन इस आत्मा को भी तृप्त |
प्यासी हैं आत्मा हैं मेरी कभी तो समझो , 
कभी तो सुनो मेरी आत्मा की ये करुण पुकार |
श्री चरणों में अनुभूति 
{भागवत के एक सर्ग से मन को छूती करुण पुकार अपने कान्हा को }



तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................