गुरुवार, 12 मई 2011

"प्राण जाएँ पर वचन न जाएँ ."

"रघु कुल रीत सदा चली आई,
प्राण जाएँ पर वचन न जाएँ ."
मेरे राम 
सत्य तो जीवन में हैं |
साकार आप से सिखा हैं राम 
जो कुछ सिखा आप से मेरे राम ,
वो सदा अक्ष्णु रहेगा ,,
बन के आत्मा का विशवास .
इन कठिन  तपस्या में भी ये अहसास हैं
साथ खड़े हो आप ,
बन के सदा स्नेह आशीष
जो में गिर  जाऊ ,
मुझे थाम हो लोगे पग -पग
कितने कठोरता से सवारना चाहो
प्रभु मुझे निस दिन ,
में करुँगी हर तपस्या तुम्हरी भक्ति की नाथ |
मेरी शक्ति , मेरा विशवास अडिग हैं|
इस मस्तक के रक्त बिंदु की तरह |
हे जगदीश्वर!
देना निस दिन कठिन तपस्या का वरदान |
इस ज्यादा आस नहीं तेरी भक्ति में मिट जाना भी हैं मेरे लिए वरदान !
  
    "अनुभूति "


बुधवार, 11 मई 2011

अक्ष्णु विशवास मेरे राम ,

मेरा सत्य, मेरे राम!
मेरा जीवन, मेरे राम !
मेरी भक्ति ,मेरे राम !
मेरा रोम- रोम मेरे राम !
आप सी शुरू होके , 
प्रभु !मेरा जीवन भी हैं 
आप की चरण सेवा के  नाम |
में गर्वित हूँ आप का आशीष
आप का आलोकिक सेन्ह पाके
इस मस्तक पर सजा रहेगा सदा 
बनके जीवन का सोभाग्य ,सम्मान |
कही दुखी नहीं में आप को पाके ,
सबको खोने का डर , 
पर आप तो आत्मा के स्वामी
हैं , मेरे नाथ !
ये देह , ये नाते सब मिथ्या भ्रम जीवन के 
आप ही से सीखती आई हूँ |
जीवन  का बदला मार्ग तो साथ सदा 
आप की छाया पायी हूँ |
कोई ग्लानी नहीं , गर्व नहीं मुझे 
मुझे गर्व हैं ,मेरे साथ हैं तेरे राम
का अक्ष्णु विशवास |
इससे ज्यादा की कोई सोच नहीं जीवन की 
प्रभु जँहा भी हो ,
उस लोक से इस लोक तक उठाते रहो सदा 
अपने स्नेह ,आशीष और ज्ञान का हाथ |
जीने को सपने दिए हैं जब आप ने 
फिर केसे में कुछ कर जाऊ ?
आप का ये ही आदेश हैं तो में 
अपने को मिटा कर भी ,
प्रभु !
तेरी आँखों के स्वप्न सभी पूर्ण कर जाऊ
मुझे समझ नहीं आई दुनिया सारी ,
समझ आई इस संसार में विरले मन की
सरलता आप की मेरे राम !
मेरे जेसा , मेरा प्रभु !
उतना सच्चा , उतना सरल
तो हम अलग कँहा |
मेरा प्रभु ! तो बसा  हैं मेरी आत्मा में ,
में बसी हूँ आप की आत्मा के किसी कोने में ,
ये कोना ही कम हैं क्या इस अभागे जीवन में |
बस देना मुझे अपनी चरण सेवा का अधिकार 
ताकि कट जाए ये जीवन ,ऋण सारे उतार |
और में पा जाऊं , 
अगले जनम में सिर्फ तेरी भक्ति करने का सम्मान |
देना आशीष कर सकूँ संकल्प
सारे पुरे जीवन के |
मुझे बस तेरे विशवास की शक्ति भरी पड़ी हैं |
यूँही  कर विशवास सदा मुझे अशिश्ते रहो 
मेरे नाथ !

प्रभु! आप के चरणों में आप की 
अनुभूति

मंगलवार, 10 मई 2011

आप के श्री चरणों में प्रभु !

हे घनश्याम!
मीरा के गोपाल !
कान्हा में न भूल सकू ,
जीवन में कभी तेरा स्नेह अपार 
तेरी भक्ति में,
में मिट जाऊ|
बस ये ही श्रद्धा  रहे इस संसार |
नित दो मेरे जीवन को दुःख से  लड़ने की शक्ति ,
नित दो जीवन के शब्द कोष को नवीन शब्दों की भक्ति .
धन्य हूँ ! कृतार्थ हूँ ! अभिभूत हूँ !
जो पाया हैं तुम्हरा आलोकिक  स्नेह ,भक्ति संसार |
हर कोई मंदिर पूजे तुम्हे में, मैं पा जाऊं 
ऐसा  नहीं सोभाग्य ,
मेरा इस जीवन
इसीलिए करती रहूँ तुझे अर्पण अपनी अंतिम सांस तक
तेरा स्नेह जीवन अधिकार |
दूर कँहा खोजू ,
तुम तो बसे हो इस मस्तक के रक्त बिंदु से
बनकर सोभाग्य , श्रद्धा , विशवास , गर्व 
और मेरी आत्मा का सम्मान |
शक्ति देना , मुझे आशीष देना राम !
में निभा सकू अपने , 
वचन और विशवास की 
सदा ये लाज |

आप के श्री चरणों में प्रभु !
"अनुभूति "



सोमवार, 9 मई 2011

प्रार्थना

हे जगदीश्वर !
जो मार्ग मेरा हेँ ,
उस मार्ग पे ले ही आये प्रभु !आप मुझे .
ले आये हो तो अब ,
सदा दे आशीष मुझे थामे रखना .
सारे रिश्ते नाते झूटे है |
एक साचा तेरा साथ ,
तेरा मार्ग |
कमजोर मुझे मत होने देना .
पल-पल मेरी आत्मा का विशवास बन कर साथ देना |
सुनती नहीं ,देखती आई हूँ जिनका कोई नहीं होता उसके लिए 
प्रभु! आप कही सोच रहे होते |
दीजो आशीष बस ये ही विनती हैं ,
तुम्हरे श्री चरणों में 
श्नात मन , धेर्य और विशवास से में इस पथ बड सकूँ |
ये दीजो आशीष राम दास हनुमान!
मेरे पास निष्ठां हो तुम सी 
हे हनुमान  !
जिससे  सदा बिना स्वार्थ करती रहूँ में 
अपने मस्तक के रक्त  बिंदु की तरह
अपने राम का सम्मान |


अनुभूति

रविवार, 8 मई 2011

कँहा पुकारू !

कँहा पुकारू ?
जाने कँहा से आये ,
और न जाने कँहा खोगये,
इस दुनिया की भीड़ में ,
इस सुने जीवन को भर दिया स्वप्नों से 
दिखा राह न जाने खो गये 
कँहा खोजू ,कित जाऊ 
किसको कहू अब मन की पीड 
जब जरुरत हैं विपदा में खो गए कँहा 
किस से पुछु जीवन पथ नवीन 
कँहा जाउंगी में इस दुनिया में
घबरा उठी हूँ .
किस राह निकलू ?
अब न सह सकुंगी 
कोई अपमान नवीन .
कहे मन कूद गंगा में पा जाऊं 
सारे संतापों से अंत .
जाते -जाते ले गए आप तो 
मेरे प्राण भी अधीन .
कोई द्वार मुझे नहीं दिखता 
न कोई संगी साथी .
पुकारू कान्हा तो,
वो  भी हो गया मौन ,
साथ नहीं मुझको कोई राह दिखा जाओ ,
समझ नहीं रहा कुछ भी
मेरे मालिक
कही तो कोई रौशनी की किरण दिखा जाओ |

अनुभूति

आशीष का उजाला

 ओ मेरे राम जी ,फैला तुम्हारे ,स्नेह,
और आशीष का उजाला चारो और , 
अब कोई अन्धकार कँहा मुझे डराएगा |
पार कर चुकी हूँ सारे सागर मोह ,माया के 
तेरे चरणों में जो अपने को अर्पण कर बेठी हूँ |
सारे मिथ्या भ्रम हैं जीवन के जानने लगी हूँ सब ,
सब कुछ झूठा 
,एक साचा तेरा नाम
मेरे राम!,राम! ,राम !
मेरी तपस्या से जो आत्मा तुम्हारी हो शांत , प्रसन्न ,
तो बना लू पूरा जीवन ही में तेरे तपस्या के अधीन |
इस मस्तक पे लगे रक्त बिंदु की तरह 
मेरी आत्मा  सदा तेरे अधीन | 
पहले तुम दिखाते रहे राह जीवन की नित नवीन
जीवन के रणक्षेत्र में उतरना ही होगा अब प्रभु 
लेकर तेरा स्नेह ,आशीष अधीन |
तुम तो अंतरयामी पहले से ,
पड़  लेते हो आने वाला जीवन पथ नवीन 
अब कँहा कोई अन्धेरा मुझे रोक पायेगा 
जिसे  मिला स्वयं हो अंखड होने का वरदान
मुझे मिला हैं उसी प्रभु का स्नेह ,आशीष ,असीम |
अब तो उजाले जीवन की राह बुहारेंगे
डर  नहीं कुछ बाकी अब कुछ खोने का
पास कुछ नहीं तो तो डर सब मिट जायेंगे 
एक आशीष , एक वचन और जीवन समर्पण
ही बस मुझे याद रह जायेंगे |
 ओ मेरे राम जी!
फेला तुम्हारे ,स्नेह,
और आशीष का उजाला चारो और , 
अब कोई अन्धकार कँहा मुझे डराएगा |
हमेशा लगे चिंता करे मेरे प्रभु मेरी
मुझे जान अबोध ,अनाथ 
दास अधीन |
ये कृपा संसार तुम्हरा क्या कम हैं प्रभु !
जो उस लोक से इस लोक में भी देते रहते हो अपनी आत्मा 
से स्नेह आशीष, असीम |
पा तुम्हारी सरलता , 
कृतज्ञता में जीवन कर बेठी तुम्हारे चरणों के अधीन |
जिस के पास खोने को कुछ नहीं, 
डर उसे इस संसार में किसका नवीन |
इन अँधेरे को मिटा दो,
अपनी आत्मा से अब प्रभु अपने
नहीं अकेली में अब , 
जो संग हैं आत्मा के तुम्हारे आशीष नवीन |
में शक्ति हूँ!
ये एहसास तुमने दिया हैं मेरे प्रभु !
शक्ति कँहा किसी के अधीन रही हैं हैं प्रभु !
वो तो सदा शिव के आगे खड़ी हैं बन के ढाल .
केसे कह दू अब की,
की कोई अन्धेरा तुम्हरे आशीष रहते
डस  जाएगा |
प्रभु रखो यकीन ,
अंधेरो से निकल कर ये सूरज एक दिन चमक जायेगा |
न चमका तो तेरा स्नेह विशवास ,अधूरा जाएगा |
न कभी मेरे रहे ये हो सकता हैं |
न हो पायेगा |
तेरा आशीष एक दिन जरुर अपना अस्तित्व पायेगा |
मेरे राम !
मेरी आत्मा को मिला  हैं
तेरे तेज का  अंश , अपने आशीष में
फिर कँहा कोई इन आँखों का सामना कर पायेगा |
केसा भी हो अब जीवन पथ 
हँसते - हँसते कट जाएगा |
अब कोई शोक ,चिंता नहीं मेरी प्रभु !
तुम्हारी इस मूरत पे अब मुस्कुराता चेहरा 
ही मुझे शक्ति दे पायेगा !
इससे ज्यादा आस नहीं इस बंधिनी की 
तुमसे मेरे राम !
"तुम्हारे श्री चरणों में अनुभूति "
 का प्रणाम करो  स्वीकार ओ मेरे राम !
अनन्य कोटि -कोटि करती हूँ 
मेरे प्रभु !
इन अश्रु धाराओं से तुम्हरे चरण धोकर प्रणाम |

"अनुभूति "



































































करुणा के सागर

हे करुणा निधे !
करुणा के सागर कभी तो,
कोई बूंद अपने दुलार की ,
मेरे नाम भी लिख !
क्या चाहता हैं प्रभु मुझसे !
केसी बंदगी ?
कन्हिया !
"तू ही तो कहता हैं,
कर्म करना ही तेरा अधिकार हैं 
फल में नहीं "!
मुझे आना ही होगा जीवन के  रणक्षेत्र में 
सारे मन के बन्धनों को तोड़ ,
में मुर्ख उनसे बांधू स्नेह की डोर
जो साथ रह के भी घोप रहे मेरे ही दिल में खंजर |
प्रभु !
बस क्या इमानदारी  की सजा ये  ही हैं |
कभी तो कर दो अपने दुलार की कोई बूंद 
मेरे  नाम |
ये कोनसी  नयी परीक्षा हैं तेरी दयानिधे  !
क्या चाहता हैं प्रभु मुझसे ?
में निकली तेरे रणक्षेत्र में तो दुनिया बहुत पीछे छुट जायेगी 
और इस दुनिया की भीड़ में भी बन जाउंगी 
सिर्फ अपने लिए जीने वाली 
स्वार्थी !

अनुभूति



शनिवार, 7 मई 2011

ओ साथिया

ओ साथिया कहूँ क्या ?
सुनलो इन आँखों से ज़रा
ये मोती हैं तुम्हारी दी खुशियों के 
जिन्दगी को एक राह दी हैं |
धडकनों को एक नया साज |
क्या हैं पूछ तो लो ?
बस तुम्हारी गुनगुनाती हुई वो मुस्कुराहट
जो सुने अब तो एक अरसा बीत गया |
फिर भी गूंजती हैं वो कानो में आज भी ,
आप का वो "तुम "
आज भी मेरी जान पे भारी हैं |
झूम जाऊ में ख़ुशी से आज भी जब कानो में मिश्री 
सपनो में ही घुल जाए |
साथ हैं बस आप की दिव्यानंद अनुभूति 
कुछ नहीं तो सपनो में मुस्काऊं 
अनुभूति



हे जगदीश्वर !


हे जगदीश्वर !
मेरे राम 
हजारो बार टूटी हूँ 
और बिखर के फिर जुडी हूँ
क्योकि मेरे कण-कण में सदा से तुम बसे हो ,
तुम्हारे निराकार रूप को देखा नहीं मेने 
प्रत्यक्ष देखने की चाह में जीवित  हूँ |

मेरे रोम -रोम के स्वामी , 
जगदीश्वर  मेरे पालनहार 
मेरे रक्षक भी तुम ही
और जो कामदेव बनके,
जीवन में आये वो भी तुम ही
हर साकार ,निराकार रूप में मेरे चारो और तुम ही हो 
मुझे नहीं चाहियें इस दुनिया के लोग 
झूठ औ र बनावट 
तेरी निस्वार्थ भक्ति और स्नेह 
और सहानुभूतियों में ही में जी सकती हूँ |
हे जगदीश्वर |
"अनुभूति "

शुक्रवार, 6 मई 2011

अंतिम कविता

अंतिम कविता 
में खोजती रही आत्मा की गलियों में 
करूणा और स्नेह से पुकारती रही |
ना कभी पहले मेरा साथ तू था 
न कभी आज खड़ा हैं मेरे ईश्वर
में लडती ही रही तुझसे 
अब नहीं लडूंगी 
न खोजूंगी किसी रामायण में 
न किसी भागवत में 
मेरा अंतस ही जब शून्य हैं 
तो क्या करुँगी इस दुनिया में जी के 
तुझे पाके 
 तू हमेशा ही पत्थर रहा मेरे लिए 
 और में फिर भी खोजती रही
तुझमे सत्य का साथ 
 ना अब कोई साथ ना दुहाई 
खतम करती हूँ ये खोखले शब्द 
और अंत हिन् जीवन का ये सफ़र 
कोई दुःख नहीं मुझे अब 
तेरे होने का 
में तो तेरी चाहत में,
जीवन की चाहत में भूल ही गयी थी 
 की तन्हा दुनिया में आई हूँ ,
और तन्हा ही जाना होता हैं |
सब स्वीकार करती हूँ ,
अब कोई सजा तू मुझे नहीं दे सकेगा  मेरे ईश्वर 
कुछ रहेगा नहीं बाकी तो क्या देगा तो मुझे कोई सजा |
अपने सारे शब्द ;अर्थ ;भाव , अनुभूतियाँ  
मोह , बंधन  ,वचन  सब कुछ यही छोडती हूँ 
सब कुछ अर्पित करती हूँ कुछ साथ नहीं जाएगा 
सिवा मेरी आत्मा के |


अनुभूति 





 

मेरा विशवास

 मेरे राम ,
पल -पल बढता ही जाए हैं मेरा विशवास 
और जग कहे तेरी बावरी मुझे 
ये अनुराग का कोनसा रूप हैं प्रभु !
कभी इस धरती पे आके मुझे तो बता दो ,
सांसो के मनको पे तुम्हारा नाम गिनने वाले को 
कभी तो अपना दर्शन करा दो | 
"अनुभूति  "

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................