मानव तन के साथ परमात्मा ने अपने ही अंश के स्वरूप सबको एक पवित्र आत्मा से अलंकृत किया है ,
उन्ही अलंकारों की जीवन अनुभूति है रसात्मिका |
सबकुछ समाप्त होता हैं पर प्रेम यात्रा करता है
अपनी दिव्य चेतना के साथ
इस लोक से परलोक
वही यात्रा है रसात्मिका
मन के तार उसी से जुड़ते हैं ,
जो जाने मन
तन की परिभाषा से,
कोसो दूर हैं मन
ये जो जाने ,
वो ही जाने मन को |
मन दर्पण हो तो जाने मन ,
मन को
क्या कहू जब सब कुछ बिन
बोले ही समझ लेते हो इस मन को !
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
हम कहे ना कहे विशवास और आत्मा से सदा साथ ही हैं क्यों समझते हो दूर हूँ ?नहीं करीब ही हूँ सदा जीवन की अंतिम सांस तक ,हां साँसों का ऐतबार यूँ ही टूट जाएगा क्या ?
तुम्हारे सवालों का जवाब मै मेरी खमोशी तुम्हारे साथ मेरे होने का एहसास ही तो हैं |
कोन कहता हैं, टूटा हुआ आइना फिर से जुड़ नहीं सकता!
उसे जोड़ने की खुदाई तो बस प्यार करने वालो के पास होती हैं |
रूह मै उतर कर रूह को जान लेने की बात ही तो सच्ची खुदाई होती हैं ,
कोई समझे ना समझे ,वो समझ गया ये ही तो ये ही तो उसकी रहनुमाई होती हैं |
जिसने समझा चाहत को ,उसी ने जाना खुदा को ,
केसे बातये हम की किसी को चाहना ही सबसे बड़ी खुदाई हैं |
मंगलवार, 29 जून 2010
तुम्हारी ख़ामोशी मेरे हर सवाल का जवाब हो ती हैं |
हमेशा मेरे हर सवाल के जवाब मै
तुम खामोश रहकर कह देते हो पगली क्या ढूंढ़ रही हैं ?
मै यही तेरे साथ .तेरे पास तो खड़ा हूँ |
हां तुम तो मेरे रोम रोम मै हो हर अंतस मै मेरे राम राम |
हर तरफ बिखरी हैं कालीघटाएं
झूम- झूम के कह रही हैं चलो आज तो कोई गीत गाये |
झूमता हैं मन इन घटाओ के साथ ,
सजता हैं तन इन फिजाओं के साथ,
क्या कहना चाहता हैं मेरे मन ,कुछ मुझको भी बता दे ?
क्यों जी उठी हूँ फिर आज मै इतना तो याद दिला दे ?