शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

आँख -मिचोली


पलकों पे  सपने सजाता हैं जीवन ,
तुम्हारे आने से गाता है जीवन .

 खामोशियों से जब तुम मेरे करीब आक
 निकल जाते हो , 
मै तुम्हारी उसी खुशबू  में महक जाती हूँ .

 किसी पौधे  में पानी डालते -डालते 
जब गुनगुना रहे होते हो ,
 वहीं बहती  हवा बनकर झूम रही होती हूँ मै,

और तुम जब महसूस करने लगते हो मुझे,
एक लहर बन कर उड़ जाती हूँ मै |


-- अनुभूति 
                          

शनिवार, 10 जुलाई 2010

मेरे अस्तित्व का सपना |



रोज सिरहाने रख कर सोती हूँ
  एक सपना ,
हां , एक सपना.

 तुम्हारे  नन्हे , नन्हे हाथो का
  तुम्हारी नन्ही आँखों का
        और, तुम्हारे दुलार और  स्पर्श का .

 दुनिया में  सब से प्यारा और
  सब से मासूम एक सपना,

  तुम्हारे इस दुनिया में आने का सपना ,

      दुनिया में इससे ख़ूबसूरत  कोई सपना नहीं.

    इसीलिए पलकों को थामे इन्तजार कर रही हूँ
      तुम्हारे आने का  ,
   हां मेरे ,पुरे होने का , 

मेरे अस्तित्व का सपना |


-- अनुभूति 

अस्तित्व




आत्मा अमिट हैं 
जानती हूँ मै
इसीलिए बिना इकरार,बिना वादे के,
      फिर भी मानती हूँ ,

 तुमको तो इकरार ,
इनकार में  बदलने का डर होता है .

और वादा फिर भी टूट जाने का डर
    तुम में ही अपने को डुबोकर 
पाया हैं  मैंने अपने आप को.

 कही कुछ खो जाने का  डर नहीं
 ना ही कुछ टूट जाने का,\
 क्योकि, मैंने  कुछ साथ बांधा ही  नहीं,

मैंने तो डुबो दिया हैं अपने को ,
तुम्हारे अस्तित्व में ,
  हां उस निराकार ब्रह में
  यानी तुममे |
  इसीलिए तुम तो सदा साथ हो,

 सदा साथ थे और सदा रहोगे |
   तो क्योकि मेरा तो अस्तित्व ही नहीं तुम्हारे बिना !

-- अनुभूति 

ख़ामोशी

आप की  ख़ामोशी भी ,
   मेरी जिन्दगी की एक अदा हैं
                मुझे आप कहे ना कहे ,
                          पर यूँही ख़ामोशी से मेरे साथ चलते रहना भी आप की  वफ़ा हैं |
             यूँही तडपना और अपनी ही  जिन्दगी से
                                   अपनी शिकायत करना ,
                 ये कुछ ना कह कर भी मेरे लिए चुनी गयीं एक  सजा हैं |
                                    आप की ख़ामोशी से शिकायते नहीं ,
                                              पर अपनी ही जिन्दगी से यूँही शिकवा करना ,
                                                         मेरी ही आँखों को आंसुओ  से नम करना हैं | |

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मन के तार

मन के तार उसी से जुड़ते हैं ,
                            जो जाने मन
        तन की परिभाषा से,
                         कोसो दूर हैं मन
              ये जो जाने ,
                         वो ही जाने  मन को |
               मन दर्पण हो तो जाने मन ,
                                                      मन को
              क्या कहू जब सब कुछ बिन
                          बोले ही समझ लेते हो इस मन को !

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

हम कहे ना कहे विशवास और आत्मा से सदा साथ ही हैं क्यों समझते हो दूर हूँ ?नहीं करीब ही हूँ सदा जीवन की अंतिम सांस तक ,हां साँसों का ऐतबार यूँ ही टूट जाएगा क्या ?
तुम्हारे सवालों का जवाब मै मेरी खमोशी तुम्हारे साथ मेरे होने का एहसास ही तो हैं |

बुधवार, 30 जून 2010

खुदाई

जिनके पास चाहत  होती हैं 
,जिन्दगी भी उन्ही के पास होती हैं |
कोन कहता हैं, टूटा हुआ आइना फिर से जुड़ नहीं सकता!
उसे जोड़ने की खुदाई तो बस प्यार करने वालो के पास होती हैं |
       रूह मै उतर कर रूह को जान लेने की बात ही तो सच्ची  खुदाई होती हैं ,
                   कोई समझे ना समझे ,वो समझ गया ये ही तो ये ही तो उसकी रहनुमाई होती हैं |
      जिसने समझा चाहत को ,उसी ने जाना खुदा को ,
          केसे बातये हम की किसी को चाहना ही सबसे बड़ी खुदाई हैं |

मंगलवार, 29 जून 2010

तुम्हारी ख़ामोशी  मेरे हर सवाल का जवाब हो ती हैं |
हमेशा मेरे हर सवाल के जवाब मै
तुम खामोश रहकर कह देते हो पगली क्या ढूंढ़ रही हैं ?
मै यही तेरे साथ .तेरे पास तो खड़ा हूँ |
हां तुम तो मेरे रोम रोम मै हो हर अंतस मै  मेरे राम राम |

शुक्रवार, 18 जून 2010

माँ |

क्या होती है माँ ?
नहीं पता मुझको ,क्योकि मै बन नहीं सकी कभी माँ
हां अपनी माँ के साकार रूप को देखा है मेने ,
इसीलिए ही शायद मन अपने स्त्री होने के अपने अस्तित्व को खोज रहा है
मुझको याद है उसका अलसुबह उठ जाना ,हमारे लिए तैयारी करना
कितना प्यार गुंधा होता था ,उन मैथी के पराठो मै ?
हां ,अब मुझको पल पल याद आता है जब मै नहीं बन सकी हु एक माँ
माँ के सपनो के आँगन से तो मै निकल आई हु यथार्थ  जीवन मै
और हां बन नहीं सकी हु माँ
हां माँ कभी मै रो नहीं सकी तुम्हारी गोद मै सर रखे ,किस्मत से शिकायत किये की मै नहीं बन सकी हु माँ
जानती हु मै जब तुम देखती हो मुझको किसी खिलोने से खेलते हुए तो क्या सोच रही होती हो ?
और होले से एक आवाज लगाकर कहती हो ,अरे क्या बचपना है ये !
मै जानती हु ,तुम कभी मेरे असीम दर्द का कोई अहसास मुझको नहीं कराना चाहती |
इसीलिए मुझको एक हलकी सी आह्ट से ही खीच लेती हो ,अपने आँचल मै
सच कहू तुमको पाकर सारे दर्द भूल जाती हु और बन जाना चाहती हु एक बार फिर वही छोटी सी तुम्हारी बेटी
हां तुम्हारा ह्रदय बड़ा विशाल है की तुम हंस कर छिपा देती हो या कभी डांट कर
मुझको पता है एक किसान तभी खुश होता है जब उसकी बचाई बिजवारी भी उसको भरपुर फसल देती है |
पत्थर पूजते पूजते भी अब हार गयी हु माँ ,
इसीलिए भाग जाना चाहती हु ,इस दुनिया से दूर छिप जाना चाहती हूँ तुम्हारे आँचल मै
हां इसीलिए की कभी ना बन सकुगी माँ |


शनिवार, 12 जून 2010

आया सावन झूम के

           हर तरफ बिखरी हैं कालीघटाएं 
                     झूम- झूम के कह रही हैं चलो आज तो कोई गीत गाये |
                                झूमता हैं मन इन घटाओ के साथ ,       
                                       सजता हैं तन इन फिजाओं के साथ,
                                        क्या कहना चाहता हैं मेरे मन ,कुछ मुझको भी बता दे ?
                                             क्यों जी उठी हूँ फिर आज मै इतना तो याद दिला दे ?
                         

गुरुवार, 10 जून 2010

सांसो का एतबार

मेरे हर सवाल का जवाब हो तुम
मेरे हर ख्याल की ताबीर हो तुम
  मेरे हर शब्द का अहसास हो तुम   
 हां कहो ,ना कहो मेरा विश्वास हो तुम
                        पूछोगे नहीं ,बिना देखे ,बिना मिले ,बिना बोले
                       इन साँसों मै कितना विशवास है
                       जितना तुम्हारी साँसों को तुम्हारी आत्मा से हैं |
                       मै जानती हूँ तुम कहोगे नहीं कभी इन पर्दों से बाहर,
                                            फिर भी बिन कहे तुम्हारी उलझनों को मै समझती हूँ |
                                              जानती हूँ सागर कभी अपनी मर्यादा नहीं तोड़ता .
                                        
लेकिन ये भी जानती हूँ जिस दिन तोड़ता हैं अपने साथ तूफ़ान लाता हैं |
                                            मै खमोशी से तुम्हारे अन्दर चल  रहे हर तूफ़ान को महसूस करती हूँ        
 फर्क  इतना है हैं तुम      सामनेआकर नहीं कहते और मै सरलता से हर अहसास को कह जाती हूँ |

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................