गुरुवार, 14 जनवरी 2010

आकाश

जीवन मै हमेशा आत्मा दुदतीअपना आकाश
दुदती रही अपना अस्तित्व
,कही मिला नहीं मुझको अपने होने का अस्तित्व
एक लड़की कभी पा ना सकी माँ और पिता की गोद मै सर रखकर रोने का अहसास ]
एक पत्नी कभी पा ना सकी ,अपनी मुसीबत के आगे खड़े होने वाले पति को
या ये कहने वाले को की तुम कोन होते हो मेरी पत्नी को अपमानित करने वाले
क्या हु मै ? बिस्तर पर सजा सामान ,जो चाहे ना चाहे उसे आगोश मै आना ही होता है ।
कोई समझ ही नहीं पाया ,या मै समझा ही नहीं पायी की मै भी एक औरत हु जो चाहती है अपना एक आकाश |
हर कोई अपना बन कर मिला क़हा मै बहत प्यार करता हूँ तुमसे ,
पर रोने को कभी कोई कान्धा नहीं होता था |
सोचती हु क्या पुरुष को असीम स्नेह और दुलार देने के लिए मेरा जनम हुआ है ?
क्या कभी कोई ये नहीं कहेगा की कब तक तुम सहती ही रहोगी ?
क्या कोई शिकायत नहीं करोगी तुम ?
हां नहीं शायद क्योकि पत्थर को पूजा तो संसार उसे भगवान् कह देगा
लेकिन किसी नारी ने अपने को मिटाकर किसी के प्यार को सीचा तो संसार उसे कुलटा बना देगा |
कितनी अजीब विदाम्ब्नाये है जीवन की तुम करो अधिकार
और मै करू तो शोभा नहीं देता |
समझ ही नहीं पायी जीवन की इस उन्सुल्झी पहेली को की क्या हूँ आखिर मै ?
क्या तलाशती हु मै ?
खो ही गयी हु मै ,पगला ही गयी हु जीवन से कभी ना मिलने वाले पिता के स्नेह और माँ की गोद को
घुट गयी हु मै |
दिल कहता है पहाडो की चोटियों पे जाकर अपने मन की सारी वेदनाओं को जोर जोर से आवाज लगाकर उस ईश्वर से कहूँ की क्यों वंचित रखा है उसने मुझसे जीवन मै मिलने वाले हर रिश्तो के स्नेह को ?
अपने अपनों को चाहा ,परायो को चाहा .पर सभी पागल ही समझते रहे |
कहते रहे पगली है ?सच कहू शायद पागल होना जयादा ठीक है इस जीवन से क्योकि किसी पागल को नहीं चाहिए होती अपने अस्तित्व की तलाश ?

जीवन के सारे भावो मै अपना सब कुछ समर्पित कर देने के बाद भी .कही कोई नहीं ऐसा जिसमे
दिखाई देता हो मुझको अपना अस्तित्व |
सब कुछ छोड़ कर ईश्वर ने दिया है मेरा साथ ,दिखा रहा है मुझको वो एक नया रास्ता ,नया आकाश
हां एक नया आकाश मेरी आत्मा के अस्तित्व का |

सरिता
























































































































बुधवार, 13 जनवरी 2010

सरिता पर बाँध

सालो से बाँध बना था सरिता के अहसासों पर
ही अन्दर कही कुछ घुट रहा था
हां ,तुमने ही तो तोड़ डाला है ये बाँध ,अपने स्नेह की असीम शक्ति से
और उसकी विशाल लहरों को दिया है अहसासों का नया आकाश
जीने की हसरते ,अपने सागर से मिलने का रास्ता |
तुमने ही तो सुनी पड़ी ,बाट जोहती दुल्हन को दिया है अपने प्रियतम से मिलने का वचन
हां तुम ही ने तो दिया है सरिता को नया ,आकाश नया जीवन |
खिल उठी है तुम्हारा असीम स्नेह पाकर सरिता
टूट गयी है सारी घुटन ,तुम्हारा चरण स्पर्श पाकर |
हां एक बार फिर हिलोरे मारने लगी है सरिता की लहरे
के झूम के वो कहउठी है तय है उसका सागर से मिलन |



तुम बिन

तुम बिन सुनी पड़ी है मन की आहटे,
तुम बिन सुनी है पायलों की झंकार ,
साथ हो फिर भी साथ नहीं ,आज हो इतिहास नहीं
कह नहीं सकी ,कभी समझा नहीं सकी तोहे मन के ये आहटे
तुमसे ही तो जीना सिखा है मेने ,तो काहे भूले हो मुझको तुम
श्रद्धा ,विशवास ,समर्पण ,पूजा और स्नेह के अथाह सागर को तुम ही समझाया है
तो फिर क्यों अपने ही विशवास की डोर से दूर क्यों हो तुम ,
तुम बिन क्या ,हंसी है मेरे होटो पे ,क्या चांदनी बिखरी है मेरे आँचल मै ।
बिसरा ही दिया है ,जीवन ने तो बिदा की नयी दुल्हन को तिन दिन के मिलन के बाद
इसीलिए तो सुनी पड़ी है ,सरिता


तनहाई

साथ हो तुम फिर भी तनहाई  है मन के आँगन मै
सब कुछ है पर तुम बिन सुनी पड़ी है आहटे

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

घुटन

दम तोड़ रही है है जिन्दगी एक अजीब सी घुटन मै
तुम क़हा हो ,दूर इस अपनत्व और प्यार से
दम तोड़ चुकी है दिल की हसरते अब ,
तुम्हारे साथ एक बार फिर जी उठना चाहती है
पर तनहा हु मै इस घुटन मै ,आज भी
क्यों साथ के साथ भी महसूस होती है ये घुटन
सोचती हु कोई राम बनकर आजाये ,और इस अहिल्या का भी उद्धार करे
आजाद कर दे इस अहिल्या को भी इस पत्थर की घुटन से
हां जीना चाहती हु मै भी ,आजाद होकर जीवन की इस घुटन से

सिर्फ अपने राम के चरणों मै |



तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................