रविवार, 15 सितंबर 2013

मनु






मेरे माधव !
मेरी आत्मा में बसे मनु हो तुम
प्रलय के बाद शांत बेठे उसी चटान पे
अपने में खोये
और में तुम्हे अपक निहारती
तुम्हारे अन्तस् की तन्हाई को
तुम कभी बंसी की धुन में बहलाते हो
तो कभी गीता का कर्म ज्ञान देते हो ....
मेरे सरल सीधे से पीया
ये क्यों नहीं कहते तुम
मेरी ही तरह
अपनी पीया की बाहों में टूट के बिखर जाना चाहते हो तुम
काहे रास रचाने के नाम पे अपने मन को बहलाते हो
टूटे- टूटे से हो ,,अन्तस् से बिखरे -बिखरे से हो
तो फिर पीया
अधरों पे बसी धर अपनी स्वप्न संगिनी को यथार्थ में बुलाते क्यों नहीं .......
वो कोई एक तो होगी न कृष्णा तुम्हारे लिए
जो बनी होगी हर श्वास
प्रियतम
सिर्फ तुम्हारी रूहे सुकून के लिए ...........श्री चरणों में अनुभूति