रविवार, 21 जुलाई 2013

ओ निर्मोही ! माधव

                                                                     
ओ पीया बंसती ...
मेरी रूह के रंगरेज ....
तेरे ही रंग रंगी हूँ ....
मैं बावरी तुम्हारी
रंगरसिया ,,,,,
ओ निर्मोही मंबसियाँ 
समझ के भी काहे तू पत्थर हो जाए ,,,,
ये ही नेक दिली तेरी मुझे भा जाए ,,,
जो तुम झुको एक कदम तो
मैं तुम्हारे रास्ते में बिछ जाऊं
जब तक श्वासों में श्वास हो
तुम्हारे ही गुण गाऊ
कोई एक तुम सा मोहे जो मिल जाता ..
काश ,,,
मेरे माधव !
तब ही तो तू मेरे स्नेह से मुक्ति पाती
इसलिए ईश्वर ने
तुझसा कोई नहीं बनाया ,,,,,,,
रुदय के कमल पे
तुझे ही आत्मा का स्वामी बनाया
ओ बसंती पीया
ये प्रीत न टूटे
न ये बंधन कही छूटें ,,,,,,,
श्री चरणों में अनुभूति यूँ ही मिटे ,,,,,,,,