शुक्रवार, 14 जून 2013

विराट ह्रदय के स्वामी ....मेरे माधव !

                                             
                                             

                                       हे मधुसूदन !
हे गोविन्द !
तुम ही थे 
जिसने दी थी मीरा को विष प्याला पिने कीशक्ति 
तुम्ही थे न जिसने हजारों अबलाओं को दे मुक्ति 
बनाया था अपनी परिणीता 
हां माधव !
वो तुम ही थे 
एक विराट रूप ,
विराट ह्रदय के स्वामी 
जिसके ह्रदय में बसा था 
राधा संग बावरी गोपियन का प्यार 
काश तुम एक बार फिर आ पाते 
एक बार फिर 
इस धरती को पावन कर जाते ....कृष्णा तुम्ही तो कहते हो 
मैं हर बार जनम लिया करता हूँ दुनिया को मार्ग दिखाने 
महापुरुषों  ,संतो ,मनस्वियों के रूप में,,,,
पर  तुम खुद क्यों नहीं आते ,कृष्णा...........
जीवन  के इस भव सागर में ,
चले आओ न
जीवन के इस आत्मत्राण को सहने की तुम शक्ति दो 
प्रभु ! 
मुझे अपनी भक्ति दो
प्रभु ह्रदय के बिखरे तारों को फिर वीणा में जुड़ने की शक्ति दो ,,,,,,
विदीर्ण हैं रुदय का आकाश 
इस पे तुम अपने विराट रूप को देखने की शक्ति दो ,,,,,,
मुक्त करो इस अन्धकार से 
ले आओ फिर उजाला ,,,,,,
फहरा दो तुम एक बार फिर सिंदूरी पीताम्बर ,,,,,,,,,,
के  सूना ये मन का आकाश हो जाए फिर सिंदूरी ,,,,,,
चले आओ न माधव !
एक बार फिर तुम 
पलके राह बुहारती हैं 
श्री चरणों में सुनी सी अनुभुति तुम्हे पुकारती हैं |
जन्हा हो स्वीकारो बैकुंठ स्वामी 
इस अभागी 
अनुभूति का ये नेह नीर चरण प्रक्षालन |
श्री चरणों में अनुभुति