रविवार, 21 जुलाई 2013

ओ निर्मोही ! माधव

                                                                     
ओ पीया बंसती ...
मेरी रूह के रंगरेज ....
तेरे ही रंग रंगी हूँ ....
मैं बावरी तुम्हारी
रंगरसिया ,,,,,
ओ निर्मोही मंबसियाँ 
समझ के भी काहे तू पत्थर हो जाए ,,,,
ये ही नेक दिली तेरी मुझे भा जाए ,,,
जो तुम झुको एक कदम तो
मैं तुम्हारे रास्ते में बिछ जाऊं
जब तक श्वासों में श्वास हो
तुम्हारे ही गुण गाऊ
कोई एक तुम सा मोहे जो मिल जाता ..
काश ,,,
मेरे माधव !
तब ही तो तू मेरे स्नेह से मुक्ति पाती
इसलिए ईश्वर ने
तुझसा कोई नहीं बनाया ,,,,,,,
रुदय के कमल पे
तुझे ही आत्मा का स्वामी बनाया
ओ बसंती पीया
ये प्रीत न टूटे
न ये बंधन कही छूटें ,,,,,,,
श्री चरणों में अनुभूति यूँ ही मिटे ,,,,,,,,

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

महकती महेंदी से .... मेरे स्नेह की तक़दीर ....

मेरी रूह के रंगरेगज !
मेरे माधव !
तुमने ही लिखी हें महकती महेंदी से ....
मेरे स्नेह की तक़दीर ....
सुर्ख महरून रंग में ,रंग गयी हैं जिंदगी अब
खनकती चूडियों के साथ ये मेहँदी से सजे हाथ
अपलक प्रतीक्षा करते हैं तुम्हारी पीया ......
चले आओ न ...
अपने हाथो में थामे हाथ देख तो लो
केसा चड़ा हैं मेरे इन हाथो पे तुम्हारी स्नेह की मेहँदी का रंग ,,,,
इसलिए तो हूँ अनुरंजनी तुम्हारी ,,,,,,
हाथो में खनकती सिंदूरी चुडिया ,,
हाथो में तुम्हारे स्नेह की मेहँदी
और मस्तक पे कुमकुम का तुम्हारे विशवास का
रक्त कुमकुम बिंदु ,,,
और तन पे सजता मेरे ये गुलाबी रंग
अहसास दिलाता हैं मुझे
तुम कही भी रहो ..
परिणीता हूँ तुम्हारी .......
तुम्हारी अनुभूति श्री चरणों में ,,,,,,,
पग छूती हैं तुम्हारे इन महकते हाथो से ....
स्वीकारो गिरधर ये प्रणाम ..........

रविवार, 7 जुलाई 2013

हूँ तुम्हारी ही कृष्णा !

मेरे कृष्णा !
तुम जो होठो पे धर लो
तो हूँ मैं
रागिनी तुम्हारी ...
तुम जो रंग लो
सिंदूरी रंग में तो
हूँ मैं 
अनुरंजनी तुम्हारी ....
तुम जो बिन कहे भी
निभा लो मुझे
तो हूँ मैं
 परिणीता
तुम्हारी कृष्णा !
श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

श्री कृष्ण परिणीता अनुभूति

मेरे  प्रियतम !
मेरा खाब तुम ही थे 
ख्यालो में इसलिए तुम चले आये 
मेने तुम्हे सदा 
अपनी आत्मा से पुकारा 
इसलिए तुम चले आये 
बन के मेरे माधव !
और मैं बिन परिणय के भी बन गयी हूँ 
तुम्हारी 
श्री कृष्ण परिणीता अनुभूति

मेरे कृष्णा ! तुम सिर्फ निस्वार्थ स्नेह हो .......

         तुम एक रूप तुम्हारे अनेक
हर रूप में तुम दिव्य हो ,अद्भुत हो
संसार का हर मानव तुम्हे पूजे ,
पुकारे अपने अपने नाम .....
कोई कहे राम ,तो कोई कहे कृष्णा ,,,
कोई कहे खुदा ,तो कोई रब ..कोई कहे परमपिता ..
तो कहे मेरे इशु तुम
तुम सभी में समाये हो ..
मेने तुम्हे कण-कण में पाया
हर मानव के स्नेह में पाया
तुम बस एक हो स्नेह हाँ ,,,,,,
तुम्हारी परिभाषा सिर्फ इतनी हैं .....तुम हो निस्वार्थ स्नेह ,,,,,,,,मानव का .....
इस तुच्छ मानव का स्नेह चरणों में स्वीकारो
मेरे गिरधर !
मेरे गोविन्द !
मेरे राम !
मेरे अल्लाह !
मेरे रब !
मेरे इशु !......हर तरफ खिली इन मुस्कानों में तुम ही हो ......
हर बच्चे की मुस्कान में ..
हर आंसू में गिरती हैं तुम्हारी ही छबी ,,,,,
फिर में कन्हा खोजने जाऊं
मंदिर या गुरु द्वारे ,,,,,
मेने तुम्हे पाया ...
अपने ही अंतस के धाम ...
अपने स्नेह में मेरे राम ......
अनवरत स्नेह की ये गंगा तुम्हारे चरण पखारति रहे .......जीवन की इसी मंगलकामना के साथ ...श्री चरणों में चरण प्रक्षालन स्वीकारो मेरे माधव !