सोमवार, 23 सितंबर 2013

अनुभूति





ओ माहे रूह !
मेरे हमनवाज़ !
मैं कोई किताब का पन्ना नहीं जो तुम उसे पलट दो ..
मैं जिंदगी की वो किताब हूँ
जो तुम्हारे हाथो में खुलती हैं
पलटती हैं ....
उसमे रखे मयूर पिख को
एक बार तुम फिर सिरहाने रखकर देखना
मेरी खुशबु से तुम सरोबार हो जाने वाले हो
गौर से अपने कानो की सरगमो को थामना
रोज रात तुम्हारे कमरे तक
आने में ,पेरो में बजती उन पायलो की छम -छम हूँ |
तुम्हारे कदमो में बैठ के
रोज अपना सुख -दुःख गाती एक बावरी हवा हूँ मैं
कोसो दूर से भी
जिन्हें तुम रूह से सुन लिया करते हो
वो अहसास हूँ मैं
ऑर बाँध दिया करते हो अपनी बंधनी समझकर अपने
प्रणय पाश में ,अपने मोहक गीतों की सरगमो में
हां मैं वो खुशबु हो
जो तुम्हारे गीतों से बिखर जाती हैं
चारों ऑर ......
हां मैं सिर्फ एक अहसास हूँ जिसे तुम रूह तक उतार लेते हो
सजा देते हो जिसके लिए सपनो की सेज
हां मैं तुम्हारे प्रणय की रागिनी हूँ
बस एक मीठी सी अनुभूति हूँ पीया
लेकिन कोई अध्याय या किताब का पन्ना नहीं में
जिसे तुम जब चाहो पलट दो
मैं एक जिंदगी हूँ
जिसके दम साज हो तुम .....
हां अनुभूति हूँ मैं एक अहसास बस ...ह्रदय का .....
अनुभूति 
                                                     

शनिवार, 21 सितंबर 2013

तुम ऑर मैं !

 
 
 
 
 
मेरे माधव !
यूँ मुझमे सामाये हो तुम
की होश नहीं ,
मैं तुम हूँ की तुम मैं
रागिनी हूँ मैं पीया तुम्हारी
धर लो न अधरों पे मुझे रागिनी हूँ
रंग में रंग के देख तो लो मन बसिया
तुम जेसा सच्चा कोई नहीं
तुम जिसा निष्पाप कोई नहीं
दुनिया कहे तुम्हे कहे छलिया
कौन जाने इसके पीछे
कितनी अबलाओं को तुमने अपना नाम दिया ....
सम्हाला दुनिया को जीवन का सांचा मार्ग दिया
जो किया कभी छिपा के नहीं
दुनिया के सामने किया
इसलिए तो तुम कहलाओ पगले छलियाँ
तुम छलिया नहीं सांचे मानव हो
जिसने सबको अपना नाम दिया
जिसने जिस रूप में तुम्हे पुकारा
तुमने उसे थाम लिया ..
मुझे भी यूँ ही थामे रहियो मेरे सर्वेश्वर 
मेरे राम .!
तुम्हारी चरण दासी अनुभूति

मैं इन्तजार करुँगी !

 
 मित्रों मेरी एक कविता एक मंच से
 ओ माहे रूह !
मेरे हमदम !
मेरे हमराज !
यूँ स्तब्ध सी मैं तुम्हे जाते देखती ही रह गयी
विवश थी मैं सोचती ही रह गयी जिंदगी से ऐसी क्या खता हो गयी |

तुम मौन थे सदा से ऑर मैं खिखिलाती धुप
कभी नहीं कहते थे मन की बात फिर भी मन में महक रहे थे बन के मधुप |

टूट के मेने तुम्हे चाहा ,लेकिन तुम फिर भी न मुझे समझ सके
दुनिया के ताने -बाने में उलझे तुम मुझसे बिना कुछ कहे फिर रूठ चले |

मैं इन्तजार करुँगी सदा की तरह की तुम लौट आओ
महकते मधुप बनकर फिर मेरा सूना जीवन सजाओ ....|

अनुभूति

रविवार, 15 सितंबर 2013

मनु






मेरे माधव !
मेरी आत्मा में बसे मनु हो तुम
प्रलय के बाद शांत बेठे उसी चटान पे
अपने में खोये
और में तुम्हे अपक निहारती
तुम्हारे अन्तस् की तन्हाई को
तुम कभी बंसी की धुन में बहलाते हो
तो कभी गीता का कर्म ज्ञान देते हो ....
मेरे सरल सीधे से पीया
ये क्यों नहीं कहते तुम
मेरी ही तरह
अपनी पीया की बाहों में टूट के बिखर जाना चाहते हो तुम
काहे रास रचाने के नाम पे अपने मन को बहलाते हो
टूटे- टूटे से हो ,,अन्तस् से बिखरे -बिखरे से हो
तो फिर पीया
अधरों पे बसी धर अपनी स्वप्न संगिनी को यथार्थ में बुलाते क्यों नहीं .......
वो कोई एक तो होगी न कृष्णा तुम्हारे लिए
जो बनी होगी हर श्वास
प्रियतम
सिर्फ तुम्हारी रूहे सुकून के लिए ...........श्री चरणों में अनुभूति

रविवार, 21 जुलाई 2013

ओ निर्मोही ! माधव

                                                                     
ओ पीया बंसती ...
मेरी रूह के रंगरेज ....
तेरे ही रंग रंगी हूँ ....
मैं बावरी तुम्हारी
रंगरसिया ,,,,,
ओ निर्मोही मंबसियाँ 
समझ के भी काहे तू पत्थर हो जाए ,,,,
ये ही नेक दिली तेरी मुझे भा जाए ,,,
जो तुम झुको एक कदम तो
मैं तुम्हारे रास्ते में बिछ जाऊं
जब तक श्वासों में श्वास हो
तुम्हारे ही गुण गाऊ
कोई एक तुम सा मोहे जो मिल जाता ..
काश ,,,
मेरे माधव !
तब ही तो तू मेरे स्नेह से मुक्ति पाती
इसलिए ईश्वर ने
तुझसा कोई नहीं बनाया ,,,,,,,
रुदय के कमल पे
तुझे ही आत्मा का स्वामी बनाया
ओ बसंती पीया
ये प्रीत न टूटे
न ये बंधन कही छूटें ,,,,,,,
श्री चरणों में अनुभूति यूँ ही मिटे ,,,,,,,,

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

महकती महेंदी से .... मेरे स्नेह की तक़दीर ....

मेरी रूह के रंगरेगज !
मेरे माधव !
तुमने ही लिखी हें महकती महेंदी से ....
मेरे स्नेह की तक़दीर ....
सुर्ख महरून रंग में ,रंग गयी हैं जिंदगी अब
खनकती चूडियों के साथ ये मेहँदी से सजे हाथ
अपलक प्रतीक्षा करते हैं तुम्हारी पीया ......
चले आओ न ...
अपने हाथो में थामे हाथ देख तो लो
केसा चड़ा हैं मेरे इन हाथो पे तुम्हारी स्नेह की मेहँदी का रंग ,,,,
इसलिए तो हूँ अनुरंजनी तुम्हारी ,,,,,,
हाथो में खनकती सिंदूरी चुडिया ,,
हाथो में तुम्हारे स्नेह की मेहँदी
और मस्तक पे कुमकुम का तुम्हारे विशवास का
रक्त कुमकुम बिंदु ,,,
और तन पे सजता मेरे ये गुलाबी रंग
अहसास दिलाता हैं मुझे
तुम कही भी रहो ..
परिणीता हूँ तुम्हारी .......
तुम्हारी अनुभूति श्री चरणों में ,,,,,,,
पग छूती हैं तुम्हारे इन महकते हाथो से ....
स्वीकारो गिरधर ये प्रणाम ..........

रविवार, 7 जुलाई 2013

हूँ तुम्हारी ही कृष्णा !

मेरे कृष्णा !
तुम जो होठो पे धर लो
तो हूँ मैं
रागिनी तुम्हारी ...
तुम जो रंग लो
सिंदूरी रंग में तो
हूँ मैं 
अनुरंजनी तुम्हारी ....
तुम जो बिन कहे भी
निभा लो मुझे
तो हूँ मैं
 परिणीता
तुम्हारी कृष्णा !
श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

श्री कृष्ण परिणीता अनुभूति

मेरे  प्रियतम !
मेरा खाब तुम ही थे 
ख्यालो में इसलिए तुम चले आये 
मेने तुम्हे सदा 
अपनी आत्मा से पुकारा 
इसलिए तुम चले आये 
बन के मेरे माधव !
और मैं बिन परिणय के भी बन गयी हूँ 
तुम्हारी 
श्री कृष्ण परिणीता अनुभूति

मेरे कृष्णा ! तुम सिर्फ निस्वार्थ स्नेह हो .......

         तुम एक रूप तुम्हारे अनेक
हर रूप में तुम दिव्य हो ,अद्भुत हो
संसार का हर मानव तुम्हे पूजे ,
पुकारे अपने अपने नाम .....
कोई कहे राम ,तो कोई कहे कृष्णा ,,,
कोई कहे खुदा ,तो कोई रब ..कोई कहे परमपिता ..
तो कहे मेरे इशु तुम
तुम सभी में समाये हो ..
मेने तुम्हे कण-कण में पाया
हर मानव के स्नेह में पाया
तुम बस एक हो स्नेह हाँ ,,,,,,
तुम्हारी परिभाषा सिर्फ इतनी हैं .....तुम हो निस्वार्थ स्नेह ,,,,,,,,मानव का .....
इस तुच्छ मानव का स्नेह चरणों में स्वीकारो
मेरे गिरधर !
मेरे गोविन्द !
मेरे राम !
मेरे अल्लाह !
मेरे रब !
मेरे इशु !......हर तरफ खिली इन मुस्कानों में तुम ही हो ......
हर बच्चे की मुस्कान में ..
हर आंसू में गिरती हैं तुम्हारी ही छबी ,,,,,
फिर में कन्हा खोजने जाऊं
मंदिर या गुरु द्वारे ,,,,,
मेने तुम्हे पाया ...
अपने ही अंतस के धाम ...
अपने स्नेह में मेरे राम ......
अनवरत स्नेह की ये गंगा तुम्हारे चरण पखारति रहे .......जीवन की इसी मंगलकामना के साथ ...श्री चरणों में चरण प्रक्षालन स्वीकारो मेरे माधव !

बुधवार, 19 जून 2013

अबोध स्नेह

अबोध स्नेह 
नहीं जानता वो स्नेह की परिभाषा 
इतना ही कहा करता हैं 
बहुत गहरी हो तुम ,बिन कहे भी बहुत कुछ कहती हो 
तुम खामोश रहो फिर भी तुम्हारी ये आँखे बहुत कुछ कहती हैं |
उसके अबोध स्नेह पे में मुस्का देती हूँ !
नहीं मालुम उसे जिस स्नेह की डगर ,उसे मुस्का के उसी से छुपा देती हूँ |
ये महाआनंद का सागर हैं तो दर्द का तूफ़ान भी 
केसे तुझे समझाऊं प्रिय 
इसकी आहुति में सब कुछ भेट चढ़ता हैं ...
लेकिन पाने को कुछ नहीं खोने को सब कुछ हैं ,,,,,इसलिए तुम इन नैनों की नहीं ,इस नश्वर तन की नहीं 
तारीफ़ करो 
उस ईश्वर की जो खाली पड़े बांस में भी 
गूंज पैदा करता हैं मधुर सुरों की .....
ये नयन ,ये जीवन अब आमानत हैं उसी माधव की 
जो किसी एक का नहीं सबका हैं 
उसके रुदय में हैं तड़प पत्थर होती औरत के मन की भी 
रुदन करते भूख से बिलखते बालक की भी 
और क्रोध भी हैं दुराचार करते कंस जेसे इंसानों के खिलाफ |
तुम नहीं समझ सकोगे अभी स्नेह की परिभाषा 
क्योकि तुम उलझे हो अभी भी जुल्फों के पेचों में 
नयनो की गहराई में 
में नहीं ,प्रिय 
वो मृगनयनी 
वो कोई और होगी 
वो कोई और होगी .....
क्योकि में परिणीता हूँ उस जगत के पालनहार अपने विष्णु 
हां जन्मो से ही अपने नाम के साथ दासी हूँ उसके कदमो की ,,,,,,
तुम्हारी नहीं किसी और की हूँ में 
ओ अबोध स्नेह .......
ईश्वर दे तुम्हे कोई और मृगनयनी 
इसी सुन्दर कामना के साथ .....
कृष्ण परिणीता अनुभूति

रविवार, 16 जून 2013

अनुरंजनी हूँ तुम्हारी कृष्णा !

हे मधुसुदन !
हे घनश्याम !
भोर की वेला में भी अँखियाँ बहाती हैं नेह नीर
तुम जन्हा हो गिरधर
स्वीकारो
ओ बैकुंठ के स्वामी ये आँखों से बहती प्रीत
आत्मा के अंतिम छोर पे बस गए हो
दुनिया के स्वार्थो से परे   
बन रूह का सिंदूरी सूरज ......
में साथ हूँ तुम्हारे उन चरणों के
जनम से ही ,
जनम नाम लक्ष्मी  
में  चरण संगिनी हूँ माधव तुम्हारी ...
केसे छोड़ दूंगी में तुम्हे पीया बसंती
मेरी रूह के रंग रेज
रंगी हूँ में तुम्हारे ही रंग
अनुरंजनी हूँ तुम्हारी
स्वीकारो
मेरे सरल सीधे माधव
भोर का ये स्नेह अश्रु प्रक्षालन ...........
कृष्ण परिणीता अनुभूति

शनिवार, 15 जून 2013

तन बिकते मिटटी के मोल

 
   मेरे माधव ! 
मेरे पीया १
मेरे ठाकुर ! 
जो कुछ मेरा हैं सब हैं तुम्हरा 
में तो सदा से अज्ञानी 
ज्ञान हैं तुम्हारी वाणी 
जो तुमने कह डाला मेने कर डाला 
जो तुमने दिया मेने स्वीकार किया 
मुझे समझ न आई कभी जीवन की काहानी 
तन बिकते मिटटी के मोल 
यंहा कोई नहीं रूह का खरीदार 
एक तुम्हे ही पाया मेने जगत विधाता 
इसलिए सर्वस्व तुम्हे अर्पण कर डाला 
क्या पाना ?
क्या खोना ?
इन सबसे मेरा न अब कोई दूर का नाता 
जिसने दिया जीवन उसकी की चरणों में सबकुछ अर्पण मेने किया ]
अहंकार{ये अन्तस् का में }भी अर्पण 
तो क्या अब मेरा तेरा 
में पगली तू न जाना  रे ,,माधव 
इसलिए उलाहना ये दे डाला .........
तुम जब छोड़ गए थे गोकुल 
तुम्हारी ही रज कण मस्तक पे लगा मेने ये जीवन सम्हाला 
कितने सारे आते रहे तूफ़ान 
पर मेने तुम्ही में अपना सब कुछ पा लिया .
हंसना ,
गाना रोना 
छेड़ना तुम्हे
सोलह सिंगार तुम्ही से कहना ,लजा जाना  .
अपने ममत्व  की प्यास
तुम्ही से हैं कायम
स्नेह और श्रद्धा की रीत सदा से |
छिनना ,पाना नहीं स्नेह की रीत 
तुम क्या जानो !कृष्णा 
इस जगत आतम त्रान की केसी हैं मानवो की रीत
 श्री चरणों में अनुभूति ..

शुक्रवार, 14 जून 2013

विराट ह्रदय के स्वामी ....मेरे माधव !

                                             
                                             

                                       हे मधुसूदन !
हे गोविन्द !
तुम ही थे 
जिसने दी थी मीरा को विष प्याला पिने कीशक्ति 
तुम्ही थे न जिसने हजारों अबलाओं को दे मुक्ति 
बनाया था अपनी परिणीता 
हां माधव !
वो तुम ही थे 
एक विराट रूप ,
विराट ह्रदय के स्वामी 
जिसके ह्रदय में बसा था 
राधा संग बावरी गोपियन का प्यार 
काश तुम एक बार फिर आ पाते 
एक बार फिर 
इस धरती को पावन कर जाते ....कृष्णा तुम्ही तो कहते हो 
मैं हर बार जनम लिया करता हूँ दुनिया को मार्ग दिखाने 
महापुरुषों  ,संतो ,मनस्वियों के रूप में,,,,
पर  तुम खुद क्यों नहीं आते ,कृष्णा...........
जीवन  के इस भव सागर में ,
चले आओ न
जीवन के इस आत्मत्राण को सहने की तुम शक्ति दो 
प्रभु ! 
मुझे अपनी भक्ति दो
प्रभु ह्रदय के बिखरे तारों को फिर वीणा में जुड़ने की शक्ति दो ,,,,,,
विदीर्ण हैं रुदय का आकाश 
इस पे तुम अपने विराट रूप को देखने की शक्ति दो ,,,,,,
मुक्त करो इस अन्धकार से 
ले आओ फिर उजाला ,,,,,,
फहरा दो तुम एक बार फिर सिंदूरी पीताम्बर ,,,,,,,,,,
के  सूना ये मन का आकाश हो जाए फिर सिंदूरी ,,,,,,
चले आओ न माधव !
एक बार फिर तुम 
पलके राह बुहारती हैं 
श्री चरणों में सुनी सी अनुभुति तुम्हे पुकारती हैं |
जन्हा हो स्वीकारो बैकुंठ स्वामी 
इस अभागी 
अनुभूति का ये नेह नीर चरण प्रक्षालन |
श्री चरणों में अनुभुति
 

मंगलवार, 21 मई 2013

उल्हाना

 उल्हाना



 हे माधव !
रूठी हैं राधा तुझसे ,,,,,,काहे तुम इतना सताओ
काहे दो बात बात पे उल्हाना
काहे यूँ सखियों संग प्रीत दिखा के मोहे जलाओ
जो में नीर बहाऊं
तो भी तुम न रोने दो
काहे करो हो मुझ अबला से इतनी प्रीत
खोज लो तुम भी अब इस दुनिया में
कोई नयी प्रीत ,,,,,,,,,,,,,,,,,
श्री चरणों में अनुभुति

रविवार, 28 अप्रैल 2013

तुम्हारी ही परिणीता

                               
मेरे माधव !
पग में घुँघर मेने बांधे तुम्हारे नाम के
जो बंधनी में तुम्हारी कहलाई
एक जनम की कीजिए बात
पर में हर क्षण पल तुम्हे ही पुकारूँ
पीया ,,,माधव माधव माधव कहते
तुम्हारी ही परिणीता कहलाऊं ......श्री चरणों में अनुभूति

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

तुम्हारी माया तुम ही जानो !


मेरे गिरिधर !
मेरे राम !
ये कैसी लगी हैं तुझसे स्नेह की रीत 
न जानू में आँखों से बहती ये प्रीत 
काहे सजा दिए जाते हो पल-पल 
एक सीधे साधे इंसान को रूप बदल सताते हो ,
तुम्हारी माया तुम ही जानो 
मैं जानू आत्मा के समर्पण की रीत 
मोह नहीं इस संसार कोई 
न ही निभानी हैं इस दुनिया की कोई रीत 
इतना ही मांगा था मेने तुमसे 
सदा मुझे अपने चरणों में रहने देना 
इतनी सी बात की में नहीं अधिकारी 
तो क्या करुँगी ,लेके ये जीवन भारी 
मेरे कृष्णा !
बस यूँ ही नीर बहाते- बहाते
निकल जाए ,तुम्हारे उन गुलाबी चरणों में मेरे प्राण 
एक अंतिम विनती ,
एक अंतिम पुकार 
इस आत्मा की तुम सुनना 
जिस बैकुंठ में तुम 
अपने चरणों की सेवा देना 
जो लक्ष्मी नाम तुमने मोहे जनम दिया 
इस जीवन नहीं ,मृत्यु बाद मुझे बस ये एक सुख देना 
भ्रम ही भ्रम हैं इस संसार 
कही नहीं सत्य जगत का अक्ष्णु आधार 
एक बार फिर चले आओ 
इस संसार की धरती पे बन के 
मेरे राम !
 नहीं तो ये श्वासे 
तुम्हे पुकारती -पुकारती 
अपनी ही तबाही का आलम खुद लिखलेंगी 
अब वक्त हैं बहुत ही कम 
चले आना तुम ,
जिस तरह आये थे शबरी के के पास
चले आना तुम चले आना तुम 
मेरे राम !
सत्य कही न मेरा टूट जाए 
ये जीवन ज्योति 
ये भक्ति मेरी 
कही तुम्हरे चरणों में आने से पहले धुल न हो जाए 
या तो तुम चले आना 
नहीं तो इन श्वासों को बुला लेना 
तुम अपने धाम ....मेरे राम !
एक तुम ही हो सत्य 
इतना ही जानता हैं ये भोला मन 
या तो विलीन  करो मूझे अपने चरणों में 
या विराट रूप धर मोहे 
इन अंधेरों में मार्ग दिखाओ 
मेरा पथ जीवन नहीं 
तेरी ही साधना हैं मेरे राम 
दिन रैन ,श्वास श्वास .रोम-रोम 
इस आत्मा के कण-कण में तुम ही बसे हो मेरे राम !
केसे तुम्हे निकाल हदय से 
एक पल जी पाऊं 
केसे तुमको ओ राजीव नयन 
ये बावरा मन दिखलाऊं 
मेरी मुक्ति का मार्ग दिखाओ मुझे मेरे प्रभु !
 जिस  दुनिया में हो जानकी नाथ !
जो सोचा अहितभी स्वप्न में किसीका
तो संसार की कठोर सजा की त्रास 
तुम मुझे देना 
दुनिया की सारा दर्द ,वेदनाये तुम मुझे देना 
ये मुस्काते -मुस्काते 
मुझे स्वीकार हैं 
पर अंतिम एक सत्य वचन तुम मुझे देना 
मेरी मृत्यु के सामने 
इन नयनो की प्यास बुझाने 
तुम ही खड़े रहना !
तुम बिन मेरी मुक्ति नहीं हो पाएगी 
मेरे राम !
श्री चरणों में स्वीकार करो 
नीर बाहते इन नयनो का आत्मीय प्रणाम