शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

साथ

                                                                   अनुभूति

मेरे माधव !इस रूह से इन लबो पे तुम खिला करते हो ,




 मेरे माधव !

अनवरत बहते हैं इन आखों से ये आंसू 
फिर भी तेरी एक मुस्कान मुझसे ,
मेरी ही जिंदगी  की खाहिश किये जाती हैं ,
मुझे कहे जाती हैं ।
 अनु !
मेरी अनु !तुम मेरे लिएजी लो ।
लाख  दर्द हैं इन आहों में 
न कोई मंजिल हैं 
न कोई साथी ,न कोई अपना ,न पराया
फिर भी तोहे रूह में बसाए 
मेरी जिंदगी मेरे इन ढलते आंसुओं में 
एक बड़ी सी मुस्कान खिलाए जाती हैं ...........
मेरी इस मुस्कान से 
मौत भी मुझसे डरा करती हैं
 जानते हो क्यों ! माधव 
क्योकि वो जानती हैं इस रूह में तुम बसते हो
 और इन लबो पे तुम खिला करते हो ......
में जानती हूँ अगर में टूट गयी तो 
तुम्हारी  आँखों से मेरे लिए देखे खाब कभी पूरा नहीं होंगे ...........
इसीलिए बेलोस मोजो की तरह में टूटती तो हूँ 
लेकिन फिर जुड़ा करती हूँ अपने असीम स्नेह समर्पण के साथ ..
में नहीं जानती ये संसार क्या हैं ?
हां इतना जान चुकी हूँ 
सबका मोल एक हस्ताक्षर से ज्यादा नहीं .............
हर अहसास ,हर समर्पण बिका करा करता हैं चंद पन्नों के मोल ....
हर  पल जिंदगी एक नया सबक सिखाती हैं 
फिर भी  में हूँ की इन लबो से सबके दामन की खुशियों के लिए दुआ किये जाती हूँ 
इन  दुआओं में मुझे दर्द नहीं होता ,बल्कि मेरा माधव 
मुस्काए  सब देख रहा होता हैं
 वो जानता हैं मैं 
 उसकी की बनाई कृति हूँ !
और मन ही मन मेरे अगले इम्तिहान की योजना बनाए बैठा होता हैं ,
आज मुझे ,
मेरे माधव !
वैसे ही याद आते हो 
जैसे तुम दोडे चले  आये थे,
 अपने सुदामा को गले लगाने
मुझे भी गले आओगे न तुम एक  दिन.................
तुम्हारा  ये ही स्नेह तो मेरी अनुपम निधि हैं माधव !
इसीलिए तो में सबसे बड़ी धनवान ,
और इसीलिए खिलती  हैं मेरे होठो पे ये तुम्हारे असीम स्नेह से मुस्कान .........
श्री चरणों में अनुभूति




हर पल अनुभूति हैं आत्मा को






 हे मधुसदन !
आत्मा से तेरा असीम स्नेह अश्रु बन फुट पड़ता हैं 
और में नहा उठती हूँ तेरे स्नेह समंदर  में ..........
सब कुछ तो सत्य हैं यथार्थ हैं 
जिसकी हर पल अनुभूति हैं आत्मा को 
फिर को माधव तुम मुझसे इतने ही रूठे बैठे हो .............
कैसी हैं तेरी ये पत्थर की मूरत से मेरी प्रीत 
में मिटटी होती रहूँ और तू मुस्काता देखता रहे 
ये भी तेरे असीम स्नेह की रीत अनोखी 
मीरा भी पी गई थी विष प्याला 
अब जाने हूँ क्यों ?
माधव उसमे भी होगी तेरे स्नेह की मधु 
हां ,वो मधु ओ जो हर पल में पी मुस्काती हूँ 
और रोज अपने को और खुबसूरत 
तेरी उस मूरत की आँखों में पाती हूँ 
जानते हो माधव !
रोज जब में कुमकुम लागती हूँ 
तुम्हे किसी कोने से आप  को देख मुस्काता पाती हूँ 
यूँ  ही बरसाते रहो मुझपे 
अपने स्नेह की बारिश 
जीवन देखो एक -एक लम्हा बन गुजर जाएगा 
और एक दिन वो होगा 
जब मुझे मेरा मोक्ष मेरा बैकुंठ 
किसी चिता की अग्नि में प्रभु आप के हाथो मिल पायेगा ........................
श्री चरणों में अनुभूति का स्नेह अश्रुओं से नमन ,,,,,,,,