सोमवार, 21 मई 2012




हे मधुसुदन !
मौत भी मेरी मुस्कुराहठो को देख के 
मुस्कुराके लौट जायेगी 
जाने हैं क्यों ?
मेरे मुरलीमनोहर !
क्योकि वो जान लेगी की 
इन मुस्कुराहटों में तुम मुस्काते हो ......
श्री चरणों में मुस्काती हुयी अनुभूति

हूँ मैं ,अपने गिरधर की







मेरे माधव !
मुकुंद बिहारी !
हे गोविन्द ! 
इन अखियन में बसी हैं तुम्हारी मुस्काती छबी प्यारी 
में तो तेरी इस नादानी पे मुस्काती ही जाऊं 
तुझे मानू मे संसार का सबसे बड़े छलिया 
पर तेरी अधरों कि इस बंसी कि 
अजीब सी धुन पे मे मुस्काती ही जाऊं 
तुझसे मेरे स्नेह का नाता 
केसे सोच सकते हो गिरधर 
तेरी नाराजगी पे 
,तेरे रूठने पे मे तोड़ जाऊं 
साँसों के बंधन तो साँसों के साथ जाते हैं 
रूह में बसे नारायण तो रूह से केसे जुदा हो पाते हैं 
तेरी इस नादानी पे जी करता हैं 
आज में करूँ सोलह शृंगार 
और कहूँ आज मुझमे हिम्मत हैं कहने कि 
गोविन्द मुक्त हुए आत्मा से गुजरे दिन 
ही ये झूठे बंधन ,
अब में मुक्त हूँ !
किसी बोझ से 
जन्हा हूँ जैसी हूँ !
हूँ मे अपने गिरधर की
अब तो बजाओं बासुरी और में खुल के झूम पाउंगी 
कोई बोझ आत्मा पे नहीं हैं 
मे आज पग में पहन पायल नाच पाउंगी 
हां मेरे गिरधर !
मिलना बिछडना इस संसार वालो कि रीत 
तुझसे तो मेरी आत्मा कि जन्मो कि प्रीत 
अब मे तेरी हूँ |
तेरी ही रहूंगी अब दूर हूँ या पास 
हर श्वास तन मन में तुझे समाये 
ये जीवन के नवीन प्रभात 
श्री चरणों में मुस्काती हुयी अनुभूति आज