गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

ये तेरी केसी माया हैं ,मेरे गिरिधर !



 मेरे  ठाकुर !
रोज रात आती हैं और
तुमसे मिलने की ,
तुम्हरा ही, अनुराग पाने की 
एक नयी खाहिश जगा जाती हैं ........
मेरे माधव ! 
कैसी तृष्णा हैं ये जीवन की !
जिसका अस्तित्व भी कही नहीं 'युग पृष्ठ पर "
उसकी के होने का पूर्व आभास करा जाती हैं ,,,,,,,,,,,,
ये तेरी केसी माया हैं
मै सोच सकती तो, कब का पा भी लेती 
लेकिन तुम तो कबसे सब कुछ सोचे बैठे हो !
ये आभास कराने में जिंदगी कितना वक्त लगा जाती हैं ..................
मेरे  गोविन्द !
इतना जान लिया मेने आज
तुम कहा से कब .क्या कर दो तुम ही जानो 
हम दुनिया वाले तो बस तुम्हारी लीला देखते ही रह जाए 
और जिसपे बीते वो आश्चर्य से 
तेरी भक्ति के सागर में डूब जाए 
ये तेरी केसी माया हैं ......................
श्री चरणों में अनुभूति