बुधवार, 12 दिसंबर 2012

                         रूह का चातक प्यासा मर जाया करता हैं 
                         कितने ही बरसे सावन 
                               प्रिय ,फिर भी वो स्वाति नक्षत्र की बूंद से ही प्यास बुझाया करता हैं |
                    



रविवार, 9 दिसंबर 2012

ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !

                             

Photo: मेरे ठाकुर ! 
मेरे राम ! 
कित छिपे हो घनश्याम ,
मन तडपे हैं 
पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम 
केसी हैं विपदा ये 
तुम ही जानो श्याम 
ओ मन बसिया ,
श्वासों के मालिक 
घड़ी हैं कैसी अजीब 
बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन 
ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !
ओ मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ
मेरे ठाकुर !
मेरे राम !
कित छिपे हो घनश्याम ,
मन तडपे हैं
पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम
केसी हैं विपदा ये
तुम ही जानो श्याम
ओ मन बसिया ,
श्वासों के मालिक
घड़ी हैं कैसी अजीब
बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन
ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !
ओ मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ