शनिवार, 30 जून 2012

ये कैसा हैं रिश्ता ! मेरी आँखों से इन अश्को का|







ये कैसा हैं रिश्ता !
 मेरी आँखों से इन  अश्को का
दुनिया मुझे खफा हो भी जाए ,
तो भी ये जालिम साथ निभाते हैं जिंदगी का |
मैं इनके बिना जीने की सोचूं 
तो भी कभी हालते जिंदगी ,
ऐसे हँसी खाब दिखा के खुशी से
मेरी आँखों में लाती हैं ,
तो कभी इन्ही खाबो के टूटने का मातम मनाती हैं |
ये कैसा हैं रिश्ता!
 मेरी आँखों से इन  अश्को का|
अनुभूति 

तेरी इबादत हो कैसी ?

मेरे खुदा !
तेरी  साँसों की खुशबुओं से ही,
 मैं अब तक ज़िंदा हूँ 
तुझे क्या  पता!
तेरे बिन जिंदगी का तनहा गुजरता लम्हा हूँ  ,मैं

फ़रिश्ते  ही मिला करते हैं क्यों मुझे !
इस खुशी में ही  ,
 दीवाना, एक खुदा का बंदा हूँ मैं

जो ये दर्द न हो दिल में तो .
तेरी इबादत हो कैसी ?
अश्को से तेरी इबादत करने
 का अपना ही मजा हैं 
में लुटा दूँ ,ये जिंदगी तो कम है ,मेरे खुदा !
 बस दुआ करता हूँ में 
तुझे  में हँसता देख 
तेरी मुस्कुराहटों से में भी जीता रहूँ और ता उम्र करता रहूँ मैं तेरी इबादत


शुक्रवार, 22 जून 2012

                                                                हे मधुसुदन !
                                                              तुम्हारी ही दया हैं 
                                      जिन्दगी कभी -कभी खुबसूरत लम्हों को बहुत करीब लाती हैं 
                                               इसी खुबसुरत दिन के साथ जिन्दगी का एक ख़ास  
                                                            पसंदीदा नगमा श्री चरणों में 
                                                                               
                                                        

गुरुवार, 21 जून 2012

                                                         एक खुबसूरत नगमा
                                                        श्री चरणों में अनुभूति 

पाहि माम ! पाहि माम !पाहि माम !

                                                          मेरे माधव !
                                                कहूँ क्या में ,हालत ऐ जिन्दगी 
                                                      एक तू ही तो सब जाने हैं 
                                                 मेरा कोई दर नहीं तेरे बिना 
                                         अजीब से हालतों से गुजरती हैं जिन्दगी 
                                                 दिल कहता हैं कहूँ दूँ तुझे 
                                             की तेरे चरणों के सिवा मोक्ष नहीं मेरा 
                                                     सोचता हैं मन कहूँ केसे ? 
                                             दुनिया माने हैं तू भी मुझे न कह दे स्वार्थी 
                                                    बस ये ही खोफ दिल में बसाए 
                                               पखार रही हैं आत्मा तुहारे ये चरण 
                                                                   मेरे माधव !
                                                                   मेरे प्रभु ! 
                                                  तारो मुझे,मार्ग दो जीवन का मुझे 
                                                 पाहि माम ! पाहि माम !पाहि माम !

सोमवार, 11 जून 2012

आज लिखो एक लेख मेरे भी जीवन का

      हे नीलकंठ !
सारा विष अपने कंठ में समाये मुस्काते हो 
आँखों से अपनी 
सब कहके भी ऐसा क्या हैं जो मुझसे छिपाए हो ?
प्रिय !
में दासी हो तुम्हारी ,इन नैनों से पड़ती आई हूँ !
तुम्हारी मूक भाषा ,आज तक समझती आई हूँ !
कोई ऐसी तडप क्यों हैं ?
या  कोई ऐसी अभिलाषा ?
जो में चाहूँ ,आप चाहे 
प्रभु !
विष्णु चरण में बैठ  भक्ति में लीन हो जाए 
कुछ  देर प्रलयंकर भी 
वासुदेव के चरणों में ये रीत निभाए
में तो सदा निभाती आई हूँ तुम्हारी आज्ञा 
बनी हूँ प्रियं ,तुम्हे सुख देने को 
लेकिन अभी इन नशीले नैनों को 
थम जाने दो 
प्रभु !
आप के इस दिव्य रूप से मुझे इस भोतिक संसार की धरा पे भी आने 
जो संग हो सदा तो
मेरे साथ बसों इस भोतिक संसारकी लेखनी में 
आज  लिखो एक लेख मेरे भी जीवन का 
दिशा दो ,
अपनी अनुभूति को 
तुम्हारा  प्रत्यक्ष ये लेख मेरी भक्ति का ,स्नेह सत्य का विशवास का मान 
बढाएगा 
व्रती हूँ में भी आज तेरे ही नाम से 
ओ ,भोले शंकर
स्वीकार कर मेरी आराधना 
मुझे आज अपने स्नेह की प्रत्यक्ष छबी दिखाओ ।
विनती  ये ही श्री चरणों में आज अनुभूति की स्वीकारो 
मेरी पुकार पे 
प्रत्यक्ष पधारो ।

अनुभूति

रविवार, 10 जून 2012

मेरे भोले नाथ ! मैं तेरी ही क्षरण में मोक्ष पाऊं |

     मेरे शिव !
 मेरे भोले नाथ !
 या कहूँ,
 आप को नीलकंठ 
जहाँ देखूं में आप ही को पाऊं 
छोड दुनिया कि चिंता ,
आप ही के साये में सो जाऊं 
मैं   निर्भय हूँ !
पाकर तेरी छावं 
ओ प्रलयंकर !
कितने जन्मो तपी हैं तेरी सती
और कितनी ही बार तेरे सम्मान के लिए 
उसने स्वीकारी हैं यज्ञों में अपनी आहुति 
चाहे ,उसे तुम राम बन मिले हो 
चाहे, मिले हो बन के ,शिव 
अनवरत तुम लेते रहे हो ,उसकी परीक्षा 
और वो होती ही रही हैं स्वाहा 
प्रिय !
क्यों नहीं जान सका पुरुष 
स्त्री के लिए पुरुष के  सम्मान में ही ,
सेवा में ही संसार का सबसे बड़ा सुख बसा हैं 
तुमने मजबूर ना किया  होता ,
तो कंहा एक नारी ने 
घर कि दहलीज को लांघा होता |
उसने तो दे तुम्हे सम्मान,
 सदा तुम्हरे पुरुषत्व का मान किया हैं |
जिसका हाथ थामे वो बाबुल घर से आती हैं 
तुम्हे क्या पता ,तुम्हरे स्वाभिमान के लिए 
वो उसी घर कि यज्ञशाला में आहुति बन जाती हैं |
जिसने दी हैं स्नेह कि छावं वो सब कुछ पा जाता हैं 
वो प्रलयंकर भी हो तो स्त्री के वात्सल्य 
से अभीभुत बालक हो जाता हैं |
कंहा समझ सकते हो पुरुष तुम 
एक इस नारी देह कि वास्तविक सुंदरता 
इसलिए संसार में अतुप्त भटके फिरते हो |
हां इस आत्मा का, इस देह का भी अधिकारी वही 
जो दे इसे सम्मान ,स्नेह और सुरक्षा कि दे शीलत छावं 
अपना पुरुषत्व निभाता 
वही  सच्चा अधिकारी हैं जो जन्मो ,जन्मो 
अपनी सती को पाता हैं |
हर जन्म मुझे देनी पड़ी ऐसी कई परीक्षा 
तो प्रभु ! 
मेरे भोले नाथ !
में तेरी ही क्षरण में मोक्ष पाऊं 
जन्मो तेरी ही बंधिनी ,तेरी ही दासी 
तेरी ही बंधिनी हो 
अपने स्वामी का 
सम्मान अपने प्राण से भी चुकाऊं 
श्री चरणों में स्वीकारो आज 
अपनी सती का आत्मीय चरण वंदन
मुझे  यूँ ही जिवंत रखना देके अपने स्नेह कि शीतल छावं 
में हर विष प्याला पी जाउंगी 
मेरे  शिव में हर जन्म तेरी सती बनकर 
तेरी लाज निभाउंगी |
श्री चरणों में अनुभूति


शनिवार, 9 जून 2012

तेरी माटी की मूरत से मेने प्रीत काहे जोड़ी

मेरे मुरली मनोहर !
हे पीताम्बर धारी !
हे मधुसुदन !
हे घनश्याम !
तेरी माटी  की मूरत से मेने प्रीत काहे जोड़ी
सारी  दुनिया कहे मोहे तोरी
पर तू दूर खडा सुनता रहे निर्मोही
और में भी दीवानी
इस संसार अपने मातृत्व की  ,कृष्णा
एक तुझसे ही आस लगाये
चरणों में बैठी रोती  रहूँ
सब कहे पुकार तेरे ठाकुर को
में पुकारूं
पर ये जानू ,इस दुनिया में न जाने मुझसे कई दुखी होंगे
पर वो उनकी चिंता कर ले
फिर एक नजर बस स्नेह से मेरी और भी देख ले
कोई आस नहीं और मोरी
एक वचन तेरे कदमो में दिया निभाने को
ही में जी रही ,ओ निर्मोही
वरना आस नहीं और बची
मेरी जीवन से कुछ पाने की भी अब थोड़ी
अविरल बहती हैं इन आखो से ये अश्रु धारा
पग तेरे पखारने को तरसा करती हैं
रोज गुलाबी चरण चूमने को तेरे
अपनी ही सासों से लड़ा किया करती हैं
लड़ते -लड़ते भी हारी हूँ
जो तुम न हो ,तो ये जीवन का हर क्षण मुझपे भारी हैं
हे कृष्णा !
मेरी भक्ति की लाज रखना
मेरे इस बाँझ होने के कलंक को तुम हरना
हरना प्रभु !
इतनी ही विनती हैं ,इतना ही विशवास
कान्हा तुझपे मोहे
कभी तो बाल रूप धर
अपनी एक छबी मोहे आंचल भी दीजो
हां दीजो न करुना सागर
तुम्हारी अनुभूति ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

शुक्रवार, 8 जून 2012

Udja Bhanwar - Manna Dey, Rani Rupmati Song

में जन्मो से तुम्हारी हूँ !





मेरे माधव !
दुनिया में उन बहुत कम लोगो में से हूँ 
जिन्होंने तेरे चरणों का आशीष पाया हैं 
तुझे अपना मान ये कुमकुम 
अपने मस्तक पे सजाया हैं ,
मेरी हाथो की ये बसंती कंगना  और
 ये मस्तक पे चमकती कुमकुम की रेखा
 मुझे पल -पल ये अहसास दिलाती हैं की मेरे राम ! 
में जन्मो से तुम्हारी हूँ 
चाहे में कहूँ राम चाहे माधव 
हर  श्वास बंधनी तुम्हारी हूँ 
मेरा जीवन तुम्हे अर्पण मेरे आराध्य !
मेरे श्याम !
मेरे माधव !
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति  

बुधवार, 6 जून 2012

जीवन का वास्तविक सत्य

                                                                     मेरे आराध्य 
                                                   मेरे प्रभु सीता राम के चरणों में एक गीत 
   कुछ गीत जीवन में इतने सत्य और सार्थक होते हैं की उन्हें अपना लिया जाए उनके अर्थ को स्वीकार कर लिया जाए दो दुरूह जीवन भी सरल हो जाता हैं जीवन के लक्ष्य का पता चल जाता हैं ,स्नेह में मिटना और भगवान के चरणों की भक्ति में मिटना ये ही जीवन का वास्तविक सत्य हैं ।
                                                     श्री चरणों में अनुभूति 

मंगलवार, 5 जून 2012

ले लो,मेरे प्राण ,एक भेट समझ स्वीकार





 ऐ जिन्दगी !
मुझे तुझसे मोहब्बत हैं .
कुछ लम्हा ,कुछ दिन और मुझे जी लेने दे
अपने माधव  की पन्हाओं में 
ये एक खाब हैं 
टूट न जाए , 
मेरी सांसो की लडिया 
मेरे माधव !
तेरे कदमो में आने से पहले 
में हर घडी अब जिन्दगी से 
अपना दामन फैला के ये ही दुआ माँगा करती हूँ !
मेरी जिन्दगी का गुजरता हर लम्हा मेरी हर सांस पे भारी है 
एक तरफ तो तेरे कदमो में आने की आरजू 
और दूजे पल ये जिन्दगी के सितम मुझपे भारी हैं 
विद्रोह कर बैठी हैं लाचार जिन्दगी अब 
हां ,सरिता तोड़ चुकी हैं सारे बाँध 
रूह का पंछी हैं 
श्याम !
बस तेरे बैकुंठ ,
तेरे चरणों को चूमने को बेताब ,
हां पग पखारना चाहती हैं सरिता अपने सागर के स्वामी 
तुम्हारे ,मेरे जगदीश्वर !
मेरा मोक्ष तेरी हैं चरण सेवा 
बस मेरी ये साँसे लड़ ले अपनी मौत से 
ये दुआ करना मेरे मालिक 
हालत ऐ जिन्दगी फिर भी तेरी भक्ति ,तेरे अक्ष्णु विशवास 
के सहारे अंतस से खिलती हैं 
लेकिन भोतिक रूह दम तोड़ रही हैं 
मेरी शिराए फट रही हैं 
लगता हैं ये जिस्म तोड़ के मेरी रूह 
तेरे कदमो से  लिपटने को बेताब हैं 
केसे कहूँ माधव ?
किसे समझाऊं हालते जिन्दगी 
बस तेरी ही बाहों में आके मरने को बेताब हूँ 
हां सरिता अपने सागर में खोने अपना अस्तित्व अंतिम श्वासे ही गिन रही हैं 
हे प्रभु ! 
मेरे भोले नाथ !
 इन श्वाओ की बस तब तक तुम रख लो लाज .................
श्री चरणों में अनुभूति बैठी हैं ले आज एक करुण पुकार साकर छबी धरो माधव आज 
नहीं तो ले लो मेरे प्राण ,एक भेट समझ स्वीकार 
अनुभूति