बुधवार, 12 दिसंबर 2012

                         रूह का चातक प्यासा मर जाया करता हैं 
                         कितने ही बरसे सावन 
                               प्रिय ,फिर भी वो स्वाति नक्षत्र की बूंद से ही प्यास बुझाया करता हैं |
                    



रविवार, 9 दिसंबर 2012

ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !

                             

Photo: मेरे ठाकुर ! 
मेरे राम ! 
कित छिपे हो घनश्याम ,
मन तडपे हैं 
पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम 
केसी हैं विपदा ये 
तुम ही जानो श्याम 
ओ मन बसिया ,
श्वासों के मालिक 
घड़ी हैं कैसी अजीब 
बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन 
ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !
ओ मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ
मेरे ठाकुर !
मेरे राम !
कित छिपे हो घनश्याम ,
मन तडपे हैं
पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम
केसी हैं विपदा ये
तुम ही जानो श्याम
ओ मन बसिया ,
श्वासों के मालिक
घड़ी हैं कैसी अजीब
बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन
ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !
ओ मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ

बुधवार, 14 नवंबर 2012

कैसी लीला हैं ! गिरधर




  हे मधुसुदन !
                                                                कंचन मन ,श्यामल देह 
                                                              और तुम्हारे स्नेह की छाँव ,
                                                                        खिली हूँ , मैं 
                                                          इन नैनों से बरसे स्नेह के बदरा 
                                                                और तुम देख मुस्काओ 
                                                                  कैसी लीला हैं! गिरधर ,
                                                                    कुछ तो कह जाओ 
                                                  काहे खामोश यूँ ही देखा करते हो तुम, मुझे 
                                                  इन नैनों में अपनी छबी देख मुस्काते हो सदा 
                                                     तुम्हारे इन मूक नैनों का पाके आलिगन 
                                                               में होती हूँ ,खिली खिली 
                                                           अपने पीया की चरण संगिनी 
                                                               तुम्हारी ये खामोशियाँ 
                                                 ना जाने कितनी बाते मुझसे करके 
                              इस जीवन के केसरी, जामुनी ,पीले रंगों की खूबसूरती कह जाती हैं 
                             सोचती हूँ कब वो घड़ी आएगी ,की तुम अपने अधरों पे सजाओगे मुरलिया 
                                          और तुम्हारी ये चरण दासी तुम्हारे नाम की पायल पहन 
                                                         तुम्हे गुनगुनाती जायेगी !
                                                           हां में जानती हूँ !
                                                       मेरे कोस्तुभ स्वामी 
                                                           वो घड़ी आएगी ............
                                                       श्री चरणों में अनुभूति 
 

सोमवार, 27 अगस्त 2012

मेरे दिलकश महबूब




ऐ जिंदगी  !
तू मुस्कुराते हुए ,मुझे अब ज़रा थाम ले 
महकती इन फिजाओं में 
मेरी इस प्यासी रूह कों 
अपनी मोहब्बत का जाम दे 
ऐ  कायनात !
रोशन हैं मेरी राहे ,
मेरे खुदा ! 
तेरी इबादत और मोहब्बत के नूर से 
अब बता क्यों न हो की ,
मेरे दिलकश महबूब !
तू भी मुस्कुराके मुझे अपनी इन बाहों में थाम ले ।

Anubhuti

रविवार, 26 अगस्त 2012

हे प्रभु ! सत्य जगत के अक्ष्णु आधार

हे प्रभु ! 
मेरे राम ! राजीव नयन !
इस सत्य जगत के अक्ष्णु  आधार 
पल -पल पुकारे 
जीवन में तुम्हे आँखों से बहती ये अश्रु धार 
चरणों में स्वीकार करो मेरे प्रभु !
ये चरण प्रक्षालन स्वीकार ।

मुझे नहीं आये कोई पूजा न पाठ 
जीवन में आधार धरा हैं मेने सिर्फ आप का 
सत्य ,समर्पण और संसार स्नेह स्वीकार 
 ये  मेरा जीवन पूजन 
ये ही भक्ति की रीत 
मिट जाए ,मिटा अपना अहम् ,
दे दूजो को सुख देने को 
ये ही मेरे समर्पण की रीत 

मेरे रोम रोम बसे कभी नील नयन 
तो कभी मुस्काते माधव ।
हर रूप हर छबी में तुम ही बसे हो 
हर लीला में तुम ही दीखते  हो 
मुझे सम्हाले साथ 
आँखों से बहे अश्रु जब भी गिरे हैं 
तुम ही पोछते आये हो 
बनके इस अनाथ के नाथ 

तुम करुणा के सागर 
अपने को मिटा के सबको सुख देते हो 
में पगली हूँ तेरी राम 
कैसे आप के दुखो को ,अपना दुःख देके में बदाऊ 
इसिलए तो में बन मीरा 
ये जीवन विष प्याला 
आप की मुस्काती छबी आँखों में देख 
मधु समझ पीती जाऊ 

धन्य हूँ ! मैं 
मेरे नील सरोरुह राम ,
तुम जो आके बसे हो इस पगली की आत्मा के धाम 
रोम -रोम मेरा कृतार्थ हुआ हैं 
जीवन महका , पंक  से निकल अब पंकज बना हैं ।

पूर्ण हुआ हैं जीवन में "लक्ष्मी का लक्ष्य "
जो 
हे राजिवनयन !
जीवन की इस भोतिक माया में आपने 
इस पगली को दरस दिया हैं ।


यूँही मुझे थामे रखना 
मेरे नाथ !
 क्षमा करना मेरे करुणा निधान 
जो मोसे कोई हो भूल ।


श्री चरणों में अनुभूति 
 

 
 

सोमवार, 23 जुलाई 2012

हे शिव !अपनी सती का इस जनम भी साथ निभाओ ................



 ओ प्रलयंकर !
देखती  हूँ क्रोध आप का 
तो कॉप जाती हैं सृष्टि सारी .
हो अविनाशी ! 
अखंड !
महाकाल!
विचित्र रूप हैं आप के प्रभु !
एक तरफ क्रोध हैं भारी ,प्रलयंकर आप का
दूसरी तरफ विष पी दे दिए हो 
सबको अमृत का वरदान भारी 
 तुम्हारी महिमा हैं न कभी जा सकनेवाली बखानी 
कभी हो इतने भोले भंडारी 
के दो राक्षसों को भी दे वरदान बलिहारी 
अपनी सती के हो प्यारे 
कितने जनम तुमने उसे तपाया 
एक  मासूम कन्या को सती बनाया 
विष्णु  शरण को छोड तुमने उसे अपना रूप सरल दिखाया 
वो  नारी तो जान ही न पाई ,
उसने एक पल में इस योगी में जो  पाया 
त्यागे  उसने पर्वत राज के महलचोबारे 
जो तुम्हे अपना मान ,मस्तक पे ये सिंदूर लगाया 
कितनी बार स्वाहा होते देखा है 
अपना ही स्नेह को  तुमने .
ओ योगीश्वर !
सब  कुछ  देख भी अनजान बने रहे सदा तुम 
बनके एक हठ साधक ,
एक हिमालय के योगी !
तुमने प्रीत सिखा के एक कंचन काया को 
कंटक का मार्ग दिखाया ...........
पता नहीं उसने कितने जन्मो में तुम्हे पाया 
में जानती हूँ तुम्हे करना था निभाना था 
इस सृष्टि का एक बड़ा काम ..................
इसीलिए  तुमने अपनी सती को तपाया 
अपनी  ही तरह एक रानी से 
योगिनी बनाया ,,,,,,,
तुम्हे जो करना हैं इस दुनिया में एक अलग ही काम 
में जानती हूँ प्रलयंकर !
इसिलए  जीवन को तुमने ऐसा बनाया 
सूना हैं मेने जीवन एक परिष्कृत मस्तिष्क द्वारा बनाई कहानी हैं 
हां इस गणेश की उत्पत्ति होनी हैं 
इसीलिए तुमने
हे विष्णु !
ये अद्भुत ,अनुपम 
लीला रचाई हैं 
मेरी आँखे देख रही हैं ये सारे होने वाले नव सृजन 
कितने अद्भुत हैं होने वाले ये अनुपम मिलन 
कितना अद्भुत होने वाला हैं 
धन्य हूँ !
में जो इतना सबमेने देखा हैं और देखने वाली हूँ 
हिस्सा हूँ तुम्हारी लीलाओ का 
ओ प्रलयंकर !
कितने रूपों के दर्शन आत्मा नित करती हैं तुम्हारे 
सदा  मुझे यूँ ही दिखाए रखना मार्ग 
और जिवंत रखना अपने असीम स्नेह कीअनुभूति 
ओ गंगाधर !
मै देखू  जब तोहरे हदय की विशालता 
तो ,देखू तुम होठो से लगा के विष प्याला हंस के पि जाओ 
लेकिन आत्मा की ये अनुभूति कभी किसे न कराओ 
प्रसन्न हो सब सह के बन के एक योगी 
धन्य हूँ!
 जो मेरी आत्मा ने की हैं तुम्हारी भक्ति
कभी तुम्हे मान अपना राम ,तो कभी एक हठ योगी 
जन्मो -जन्मो की तपस्या के बाद आत्मा कभी ऐसा सुख पाती है 
बलि हारी हूँ !
इतने विष के बाद भी 
तुम्हारी एक सजती मुस्कान पे अपना सब कुछ वारि हूँ !
हर  जनम में बनके तुम आना मेरे शिव 
और में हर बार होती अग्नि अग्नि कुंडो में स्वाहा
मांगूंगी होने का वरदान तुम्हारी सती 
तुम्हारे संग में भी ये विष प्याला पियूंगी 
बनी हूँ रुदय संगिनी तो ये भी सब सहूंगी 
सब कुछ आधा -आधा हैं 
जीवन का मधु हो या विष प्याला हो !
हे शिव !
देख तुम्हरा जीवन 
सोगंध  में उठाती हूँ जो दीखते हैं स्वपन तुम्हारी आँखों में 
मै पूरा करती जाउंगी !
लेकिन  तुम्हरे संगबिन न पूरा हो कुछ 
इसीलिए कहती हूँ 
हे योगीश्वर !
मुझे असिशो ,जीवन का मार्ग दिखाओ 
कठिन हैं ये घड़ी जीवन की अब 
अपनी सती का इस जनम भी साथ निभाओ ................
श्री चरणों में स्वीकारो 
अपनी सती का मुस्काता चरण वंदन ।
अनुभूति

 मेरी कविताये मेरी आत्मा से अपने ईश्वर की स्तुति हैं  ,वो दिव्य रूप है जिसका आत्मा नित्य प्रतिक्षण दर्शन करती रहती हैं ।इन सबका जीवन के भोतिक स्वरुप से कोई ताल नहीं हैं ,ये मेरी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हैं जो साधरण मानव के जीवन की भोतिक सोच से परे हैं ।
अनुभूति








रविवार, 22 जुलाई 2012

देखो ,कृष्णा ! अब तो बाज आओ



 ओ मुरलीधर !
मेरे चित्त चोर !
मनबसिया !
देखो जी !
अब धर भी लो अधरों पे अपने ,ये बाँसुरिया 
नहीं तो ,अब मैं तोहे अब नहीं मनाऊंगी  
काहे की ऐसी जिद ,
मुरली बजा के मुझे तुम  बुलाओ 
पहले तो मोहे सताओ 
डराओ ,उल्हाना दो 
और जब मैं  आऊं  पास तोरे रूठ के बैठ जाओ 
और मुझे ही ये रूठा मुख दिखाओ 
मुझे से तो भले दुनिया वाले 
ओ उन्हें अपनी ये मुरलिया तुम सुनाओ 
देखो माधव !
ये ठीक नहीं ,पल भर में अपने इतने रूप दिखाओ 
में सीधी सादी जानू न तोरे जितनी बतिया सारी 
काहे तुम सीधो को इतना सताओ 
देखो ,कृष्णा 
अब तो बाज आओ 
मान भी जाओ 
अब रख अधरों पे मुरलिया 
कोई स्नेह की धुन सुनाओ 
..............................................श्री चरणों में अनुभूति 

Justju jiski thee

मेरे पीताम्बर धारी !में पल -पल तरसूं हूँ पाने को तेरा वही स्नेह अपार











 ओ मेरे माधव !
पीताम्बर धारी !
मेरे पिया ,
लिखूं हूँ !
आज तव चरणन में स्नेह पांति ...............
जो देखूं में ये बरसते बदरा ,
अपनी वसुंधरा का करते सिंगार
में पल -पल तरसूं हूँ
पाने को तेरा वही स्नेह अपार 
देखूं धरती की हरियाली ,खिलते बसंती फुल
तो  मन ही मन जल जाऊं
किसे कहूँ मन की पीड़ा !
किसके सामने खड़ी हो
अपनी बासंती चूडियों की खनक सुनाऊ
एक पल में सजाये तुमने मेरे सारे स्वप्न छीन लिए
मेने जिसके स्नेह के लिए बदले अपने जीवन के स्वरुप
उसी ने दे पीड अपनी आत्मा के लिबास बदल लिए
इसीलिए तो कहती हूँ !
माधव !
तुम्हे संसार का सबसे बड़ा छलिया
फिर भी तेरेछले जाने को मन नहीं माने
क्योकि वो करता हैं तुझसे निस्वार्थ ,निश्चल प्रीत ........
सिखा हैं मेने तुझसे ही ये प्रीत का स्वरुप ,माधव
पाए बिना ही दिया हैं स्नेह तो फिर स्नेह ही स्नेह किया हैं ................

मीरा भी अपने मोहन की दीवानी थी,
मान अपने कृष्णा को सब कुछ
इस जग से बोराई थी ।
तब भी तुमने उसे संसार में तन्हा छोड़ा था ,
फिर भी उस पगली ने मेरी ही तरह तुम्हे हर श्वास
स्मरण किया था ,
हां तुम ही थे न माधव !
जिसने उस मासूम को विष प्याला दिया था ।
देखती हूँ तुम्हारे विराट रूपों को
युद्ध में खड़े होके बनते हो सारथि
बिन शस्त्र उठाये भी तुमने मार दिए थे कितने महारथी .........
इतना तुम याद रखना
 मैं  अब सहूंगी !
इस दुनिया की ,इस स्नेह की हर पीड़ा अपनी आत्मा पे झेलूंगी
लेकिन मे वो भीष्म हूँ ! जिसने सिर्फ सहना सिखा हैं,
तुम्हरे शस्त्र ना मुझपे उठाने की प्रतिज्ञा में ही तोडूंगी
और अंतिम घाव अपने इस आत्मा और कोमल तन पे झेल
प्राण तुम्हारे सामने तुम्हरे ही हाथो से त्यागुंगी .
मैं  वो सत्य हूँ !
जो विचलित होता हैं कभी पराजीत नहीं .......
पर मेरे माधव !
इस आत्मा में   तुम्हे पराजीत देखने की भावना भी नहीं
तुम क्या जानो !
तुमसे जितने में नहीं ,पराजय में कितना सुख
मुझसी प्रीत जो तुम कर जाते
मधुसूदन !
एक नया महारास तुम अपनी  राधा संग एक बार फिर रचाते
लेकिन ये कलयुग हैं कृष्णा !
मैं जानती हूँ !
तुम भी यंहा के इंसानों से  डरे हो ,,,,
इसीलिए तो अपनी आत्मा के इतने लिबास बदले हो ........
हां कृष्णा !
तुम इस कलयुग में अपना ही एक नया रूप धरे हो ,
अद्भुत हो !
अनुपम हो ,अखंड हो ! साकार होके भी निराकार हो !
जाने हो इसिलए तुम इस पगली
का चमकती बिंदिया का कुमकुम और
मेरी मांग की अद्भुत रेखा हो !
तुम तो सदा से कहा एक रूप धरे हो ,
सोचती हूँ तो अपनी इस मासूमियत पे खुद ही आंसू बहाती हूँ 
कोई नहीं समझाने वाला ,कोई नहीं मार्ग दिखाने वाले 
फिर  दिल को लगताहैं 
माधव !
तुम तो अन्तर्यामी जान  लेते हो
 किसी के मन की दुष्टता और सरलता की वाणी 
तो क्या मेरी आत्मा नहीं समझ पाए होगे 
जानते हो कोई नहीं इसके मेरे सिवा दूजा कोई 
ये पगली कैसी हैं जो जान के भी समझे ना 
दुनिया की रीत 
इसीलिए मुझे सम्हाले बैठे हो 
कहो ना पर अपना जाने बैठे हो ,जाने हो निस्वार्थ प्रीत 
समर्पण मेरे स्नेह की रीत 
हां इसीलिए बूंद -बूंद ये विष प्याला जीवन को दिया हैं |
विदिरण हैं आत्मा आज ,फट रही हैं बेबस रूह की शिराये 
किसी और से लड़ना होता तो में लड़ भी लेती 
अपनी ही आत्मा से कैसे मे लडूं !
थाम लो आज फिर मुझे अपनी बंसी की धुन से 
मेरे  इस जीवन को आज फिर वही 
अपने पीया का सिंगार दो 
इस पगली को फिर वही  स्नेह  दो
हां सूना हैं जीवन ,शून्य हैं सब कुछ तुम बिन माधव 
कभी तो आत्मा की इस पीड़ा को पहचान लो 
हां आज अपनी अनु 
को अपने कदमो में बैठ जीवन का नया ज्ञान दो .
तुम बिन में ,पल -पल ज़िंदा हूँ 
लेकिन ख़ाक हुए जा रही हूँ 
मुस्काती  हूँ बस तुम्हे मुस्काते  देखने को बस 
नहीं तो तुम्हारी सोगंध अभी में ये प्राण त्यज जाती .............
स्वीकार करो ,
टूटती बिखरती अनु का अश्रु पूरित ये चरण प्रक्षालन .....................
अनुभूति











शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

साथ

                                                                   अनुभूति

मेरे माधव !इस रूह से इन लबो पे तुम खिला करते हो ,




 मेरे माधव !

अनवरत बहते हैं इन आखों से ये आंसू 
फिर भी तेरी एक मुस्कान मुझसे ,
मेरी ही जिंदगी  की खाहिश किये जाती हैं ,
मुझे कहे जाती हैं ।
 अनु !
मेरी अनु !तुम मेरे लिएजी लो ।
लाख  दर्द हैं इन आहों में 
न कोई मंजिल हैं 
न कोई साथी ,न कोई अपना ,न पराया
फिर भी तोहे रूह में बसाए 
मेरी जिंदगी मेरे इन ढलते आंसुओं में 
एक बड़ी सी मुस्कान खिलाए जाती हैं ...........
मेरी इस मुस्कान से 
मौत भी मुझसे डरा करती हैं
 जानते हो क्यों ! माधव 
क्योकि वो जानती हैं इस रूह में तुम बसते हो
 और इन लबो पे तुम खिला करते हो ......
में जानती हूँ अगर में टूट गयी तो 
तुम्हारी  आँखों से मेरे लिए देखे खाब कभी पूरा नहीं होंगे ...........
इसीलिए बेलोस मोजो की तरह में टूटती तो हूँ 
लेकिन फिर जुड़ा करती हूँ अपने असीम स्नेह समर्पण के साथ ..
में नहीं जानती ये संसार क्या हैं ?
हां इतना जान चुकी हूँ 
सबका मोल एक हस्ताक्षर से ज्यादा नहीं .............
हर अहसास ,हर समर्पण बिका करा करता हैं चंद पन्नों के मोल ....
हर  पल जिंदगी एक नया सबक सिखाती हैं 
फिर भी  में हूँ की इन लबो से सबके दामन की खुशियों के लिए दुआ किये जाती हूँ 
इन  दुआओं में मुझे दर्द नहीं होता ,बल्कि मेरा माधव 
मुस्काए  सब देख रहा होता हैं
 वो जानता हैं मैं 
 उसकी की बनाई कृति हूँ !
और मन ही मन मेरे अगले इम्तिहान की योजना बनाए बैठा होता हैं ,
आज मुझे ,
मेरे माधव !
वैसे ही याद आते हो 
जैसे तुम दोडे चले  आये थे,
 अपने सुदामा को गले लगाने
मुझे भी गले आओगे न तुम एक  दिन.................
तुम्हारा  ये ही स्नेह तो मेरी अनुपम निधि हैं माधव !
इसीलिए तो में सबसे बड़ी धनवान ,
और इसीलिए खिलती  हैं मेरे होठो पे ये तुम्हारे असीम स्नेह से मुस्कान .........
श्री चरणों में अनुभूति




हर पल अनुभूति हैं आत्मा को






 हे मधुसदन !
आत्मा से तेरा असीम स्नेह अश्रु बन फुट पड़ता हैं 
और में नहा उठती हूँ तेरे स्नेह समंदर  में ..........
सब कुछ तो सत्य हैं यथार्थ हैं 
जिसकी हर पल अनुभूति हैं आत्मा को 
फिर को माधव तुम मुझसे इतने ही रूठे बैठे हो .............
कैसी हैं तेरी ये पत्थर की मूरत से मेरी प्रीत 
में मिटटी होती रहूँ और तू मुस्काता देखता रहे 
ये भी तेरे असीम स्नेह की रीत अनोखी 
मीरा भी पी गई थी विष प्याला 
अब जाने हूँ क्यों ?
माधव उसमे भी होगी तेरे स्नेह की मधु 
हां ,वो मधु ओ जो हर पल में पी मुस्काती हूँ 
और रोज अपने को और खुबसूरत 
तेरी उस मूरत की आँखों में पाती हूँ 
जानते हो माधव !
रोज जब में कुमकुम लागती हूँ 
तुम्हे किसी कोने से आप  को देख मुस्काता पाती हूँ 
यूँ  ही बरसाते रहो मुझपे 
अपने स्नेह की बारिश 
जीवन देखो एक -एक लम्हा बन गुजर जाएगा 
और एक दिन वो होगा 
जब मुझे मेरा मोक्ष मेरा बैकुंठ 
किसी चिता की अग्नि में प्रभु आप के हाथो मिल पायेगा ........................
श्री चरणों में अनुभूति का स्नेह अश्रुओं से नमन ,,,,,,,,

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

कँहा बन सकती हूँ में एक बादल !




ये  
खुला नीला आकाश ,
जेसे कह रहा हो मुझे,
 बह जाओ तुम अनु एक बार फिर इन फिजाओं में 
और में वक्त को थामे ,
इसी नीले आकाश में खोजा करती हूँ तुम्हे 
लेकिन तुम तो बादलो की तरह न जाने कितने रूपों में बदल गए 
और में खोजती ही रही इस नीले आकाश में तुम्हे 
दिल तो करता हैं में भी तुम्हारी तरह नीला ,सफ़ेद बादल बन जाऊं 
लेकिन फिर अपने को थामती समझाती हूँ 
की मुझमे और इस बादल में बहुत फर्क हैं 
ये में नहीं हो सकता 
क्योकि में तो सिर्फ एक हूँ 
अंदर बाहर से एक ,हां एक नदी ,,,,,,,,,,,,,,
कँहा  बन सकती हूँ में एक बादल 
तुम तो उड़ जाया करते हो पलक झपकते ही ,
एक पल में ही खोजती रहती हैं मेरी आँखे तुम्हे 
और तुम कभी नीले तो कभी सफ़ेद हो जाया करते हो 
और में खोजा करती हूँ तुम्हे इस नीले आकाश में ......................
तुम्हे अब नहीं खोजूंगी में कभी नीले बादलो में 
क्योकि अब तुम इन बादलो से आँखों से उतरे रूह में समा चुके हो 
अब नहीं बदल सकोगे कोई रंग तुम 
क्योकि अब कैद हो तुम अब मेरी इन साँसों में 
अब मे नहीं खोजूंगी तुम खोजा करोगे अल्हड,  उस नदी को 
जिसमे हर पल सिर्फ तुम्हारे ही अक्स दिखा करते थे 
जब तक शांत होकर स्नेह समर्पण करता रहा ,तुम दीखते रहे ,झांखते रहे 
अपने ही अक्स को अपनी ही रूह को खोजा किये तुम मुझमे ,
जानते हो क्यों ? 
क्योकि में निर्मल सरिता हूँ जो कभी अपना रंग नहीं बदला करती 
वो बदलती हैं अपना वेग ,अपनी दिशाएं ,अपनी राहे 
और वो पलटती नहीं कभी पीछे की और कभी वो सिर्फ बहा करती हैं 
और तुम सदा से अपना ही भविष्य ,
अपना ही रूप रंग देखने को तरसा किया करते हो उसकी निर्मलता में 
क्यों नहीं समझ सकते आत्मा की इस निर्मलता को ?
ये ही सवाल अपनी साँसों में समाये 
तुम्हारे कभी धवल ,कभी नीले तो कभी श्यामल रूपों को अपनी आत्मा में बसाए 
बह चली हैं तुम्हारी सरिता ,अपने अंत हीन सफर पे 
तुम्हे इन साँसों में संजोये ,अपनी आत्मा का सर्वस्व तुम्हे अर्पित किये 
तुम्हारे पग पखारते ,तुम्हे मुस्काते  देख 
चल पड़ी हैं सरिता अपने सागर से मिलन को ......................................
अनुभूति  
 
 

ओ रूहों के अंधेरो को हरने वाले , दिव्य, सिंदूरी सूरज !


"श्री राम "
श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकर सुधारी ।बरनऊरघुवर विमल जसु जो दायक फलचारी 
बुद्धि हीन तनु जानिके ,सुमिरौ पवन कुमार ।बल ,बुद्धि ,बिद्या देहूँ मोहि ,हरहु कलेश विकार ।
   

ओ रूहों के अंधेरो को हरने वाले 
 दिव्य ,
सिंदूरी सूरज !
मेरी आत्मा, की सत्य निष्ठा 
मेरे राम !
जानती हूँ मैँ ,
सदा तुमने विकट  परिस्थितियों में  
 सम रहकर ,शांत रहकर 
अपनी आत्मा की पुकार को सुनना
 ही संसार को सिखाया हैं ।
ये कैसे भ्रम ! 
मेरी आत्मा के समक्ष उपस्थित होने लगे हैं 
हे आदित्य !
मेरे राम के भी आराध्य 
मेरी इस आत्मा को इन भ्रमो से दूर कर 
मुझे मार्ग दो प्रभु !
सब तरफ घनघोर अँधेरा  हैं 
हैं सब कुछ साकार ,
लेकिन सब धुँधले  बादलों के पीछे छिपा हैं 
दूर कर इन अंधेरो को 
यथार्थ मेरे समक्ष उपस्थित करो .
जब तक तुम नहीं सुनते 
मेरी आत्मा से झरते ये अश्रु यूँ ही पखारते रहंगे 
तुम्हारे चरण ,
मेरा कोई नहीं था गुरु ,
तुम तो देने वाले संसार को उजाला 
इसीलिए मेने तुम्ही से सिखा था जीवन को नियमित करना 
अपना काम करना और भूल जाना 
मेरी तपस्या फिर कही टूटी है 
हे प्रभु!
फिर दो मुझे कठोर तपस्या का 
 आशीष ,ताकि में भी अपने आराध्य   की तरह 
पा  जाऊं जीवन की इस लंका का पार 
मेरे राम !
 तो मिले थे अपनी विरहणी  सीता से 
लेकिन में इस भव साग़र  को पार कर पाऊ  मोक्ष ......
और तुम्हरा ही अंश मिल जाए तुममे ,,,,,,,,,,,,,,,,
अनुभूति  









मंगलवार, 17 जुलाई 2012

मेरे माधव ! कभी न पड़े मेरी कलुषित छाया तुझपे ,

          
   मेरे श्याम !
        तेरी मोहिनी मुस्कान देख में सारे विषाद भूल जाऊं 
                 तू क्या जाने !,क्या समझे !
              मे तेरी एक मुस्कान को संसार का सारा विष पी जाऊं 
               कोई और माँगता होगा ,अब जिन्दगी 
                            मे तेरी ये मुस्कान आँखों में लिये ही बस मौत की नींद सो जाऊं .
                          न अब कोई  आरजू हैं मेरे इन आसुओं की कोई ,
                          न इस तन को सोलह श्रंगार की खाहिश 
                        जिसने किया हो तेरी साकार छबी का दर्शन 
                        वो बिन मोल बिका हैं 
                     तुझे खुद भी नहीं पता मेरे माधव !
                 मेरे स्नेह की क्या सीमा हैं !
                    कभी न पड़े मेरी कलुषित छाया तुझपे मे 
                      सदा से ये ही सोच डरती आई     
                                 इसीलिए तेरे कदमो में ही बैठती आई ................
                      तेरी इस मुस्काती छबी पे जो शिकन मेरी छाया से आई हैं 
                        कैसे मांगू अब कृष्णा में तुझसे क्षमा !
                    बस ये मेरी स्नेहिल प्रीत मुझे तुझ तक ले आई हैं ।
                                 तेरा नाम पुकारते -पुकारते खनकते थे ,बासंती कंगना ,
                    खिल उठती थी महकती थी में ,
               तेरी बंसी की धुन पे पायल   झनकाती थी ,
               घंटो खिली रहती थी चांदनी मेरे चेहरे पे 
                  अब सब छोड़ आई हूँ तुम्हारे पास 
                 अब जो पुकारूं 
             में माधव ! मेरे राम !
                तो इस आत्मा से इन गालो तक बह उठती हैं 
                     आसुओं की निर्मल गंगा ,
                आत्मा के ताप को पल-पल बहती शीतल करती 
                        मुझे ले जाती हैं धडकनों 
               के मोक्ष की और अपने आराध्य के धाम 
          श्री चरणों में अनुभूति नहीं करेगी अब कोई पुकार 
                             मुझे देख के तो तू भी हो गया हैं माधव दुखी ,करुनामय और प्रलयंकर 
                             अब दुनिया में कोई नहीं जिसको में कभी करूँ कोई पुकार ....
         अनुभूति