गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

मेरे राम !

मेरे  राम !
अजब विडंबना जीवन की
सारे दुनिया के लिए खुले तेरे रोम -रोम के द्वार
जो पल -पल इन अखियन से बस
तेरे चरण पखारे
उसके कंहा की तुमने कभी कोई सेवा स्वीकार
हर सांस ,एक आह बनके गुजर रही
जो रोते -रोते भी बस तुझे ही पुकार रही
राम -राम ,ओ मेरे राम
तुम कंहा सूना करते हो
मेरे रोम -रोम की पुकार
काहे मोहे लगना नहीं आता
इस संसार सा स्निग्ध भोग तुझे
क्यों नहीं सीख सकी में स्वार्थ की विद्या अपार
तुझ  बिनमुझसे छूटे पड़े हैं
 अन्न -जल  ,सिंगार
रूठे  हैं मुझसे निंद्रा और बयार
रोते -रोते दिन बिता हैं
,ये रात भी तकिया भीगोते बीती जायेगी
लेकिन तेरे कदमो में ना बैठ पाने की
मेरे आत्मा की प्यास
केसे बुझ पाएगी ?
केसे  तेरे कदमो की ये दासी
जी पाएगी ,
तुझे ना अहसास
तेरी बावरी मर जायगी
यूँ ही अपनी साँसों पे पुकारते -पुकारते
मेरे राम ,मेरे राम मेरे राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम


























तेरे चरणों की सोगंध

मेरे कृष्णा !
माना में तुझसे झगडू लाखो बार
केसे जियूं तुझ बिन ये बता मोहे
में रोते -रोते दे दू प्राण
तेरे चरणों में मेरे माधव !
संसार छोड़ कभी तो सुन ले मेरी आह
में क्या करू ?
इतना न जानू
सुन तो ले मेरी पुकार
किसे कहूँगी मे मन की ये आह
तुझ बिन ज़िंदा हूँ
पर कहे बिना न रह पाउंगी
मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
मोहे राह दिखा ,नहीं तो में
तेरे चरणों की सोगंध
मर जाउंगी ,में ये घुटन नहीं सह पाउंगी
न निभाउंगी कोई वचन
तेरी अनुभूति तेरे बिन न रह पाएगी
मुझे राह दिखा !
मेरे कृष्णा !

मेरे कृष्णा !तू छिपा हैं कँहा ,

मेरे कृष्णा !
ये रोती अखियाँ तोहे पुकारे
तू छिपा हैं कँहा ,
में कँहा ?
किन चरणों में बैठ करू तुमसे बतियाँ
खोल दो ,
इस रसात्मिका पे लगे बंधन
में अरज करू !
तुझसे सिर्फ इतनि ही ब्रज- नंदन
मेरे जीने की वजह एक तुम
तुम्हारे चरणों का नित वंदन
ऐसी काहें कठोरता ओडे हो
मेरे कृष्णा !
तुम बिन सुनी पड़ी हैं रसात्मिका !
श्री चरणों में सुन लो कभी तो
मेरी एक पुकार