गुरुवार, 17 नवंबर 2011




ताबीर


मेरी कोई फ़रियाद
उसके कानो तक जाती ही नहीं
मेरी रूह की बेबस सदाएं ,
पत्थरों से टकरा कर मुझ तक ही लौट आती हैं |
वो धड़कता हैं
मेरी रूह मे ,सांसो मे 
पर मेरी कोई धड़कन उस तक जाती ही नहीं |
हर घड़ी ,हर क्षण
वो मुझमे उतरता हैं इबादत की तरह ,
पर मेरी कोई इबादत उसके किसी क्षण तक जाती नहीं | 
मेरा हर खवाब ,हकीकत ,
चाहत ,इबादत और हर रिश्ता हैं वो ,
जानता हैं वो, 
पर उसकी कोई ताबीर 
मुझतक आती ही नहीं |
अनुभूति

वो जो मेरा कहने को अपना हैं !


वो जो मेरा कहने को अपना हैं !
वो सँवारना चाहता हैं ,उसके सपने .
देना चाहता हैं प्यार भरा आंगन ,
वो आँगन ,
जो मेने सींचा था
अपने स्नेह की एक –एक बूंद से ,
वो कहता हैं की उसे प्यार हो गया हैं !
शायद मुझे 
बहुत पहले ही अंदाजा हो गया था
         उसे मुझसे प्यार कभी था ही नहीं   ,,,,,,,,,,,,,,,
अनुभूति