रविवार, 21 अगस्त 2011

ये ही हैं इस जीवन का कर्म योग

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे श्याम !
कहा तुम जन्मे हो!
कँहा तुम अस्त हुए हो !
तुम तो अनवरत मुझमे बहे हो
हां तुम मेरे साथ ही थे न जाने कितने जन्मो से 
अब मिले हो साकार स्वरुप ज्ञान बनकर 
और  
अंधरे से उजाले की और प्रति पल ,
अपने ही अस्तित्व में साथ लिए जा रहे हो तुम मुझे
में धन्य हूँ मेरे कृष्णा !
जो मिले हो ज्ञान और स्नेह सागर के रूप मुझे
नित इन चरणों मे,
अपनी अखियन के श्रद्धा जल से
तुम्हारे उन चरण कमलो में प्रणाम
ये ही हैं इस जीवन का कर्म योग
मिट जाऊं में यूँ ही ,
समा जाऊं में तुझ में ही मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे श्याम !