शुक्रवार, 3 जून 2011

एक अद्भुत गीत

 मेरे भगवान !
मेरे कान्हा! मेरे कोस्तुभ धारी !
के चरणों में एक अद्भुत गीत , 
एक पुकार अपने कन्हाई को ,
       वही पुकार जो राधा ने अपने कृष्ण से की ,
सीता ने अपने राम से ,
और एक भक्त अपने भगवान से करता हैं
की जीवन में एक बार उसका साक्षात दर्शन हो |
मेरे कान्हा जी!
इस" अनुभूति "की इस संसार में और कोई इच्छा नहीं |
आप का दर्शन मेरी भक्ति और मेरा मोक्ष दोनों हैं |
 में अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण जी से करती हूँ |  
कन्हाई मेरी पुकार भी इस जीवन में सुन लो
  जिस लोक में हो ये बावरी आप को कँहा खोजेगी | 
आप को कान्हा जी !
                                                     
श्री चरणों में अनुभूति

मेरे कोस्तुभ धारी !

मेरे लिए ये कोई कविता नहीं| 
मेरे कोस्तुभधारी भगवान श्री कृष्ण! के चरणों में अन्य भक्ति से समर्पित मेरी आत्मा का फूटता स्नेह हैं जिसको पूरी तरह व्यक्त करने में में अभी भी असमर्थ हूँ !
मेरे कान्हा का नाम मेरे स्नेह के रूप में मेरी आँखों से बरसता हैं |


हे करूणा निधे!
हे दयानिधे!
हे जगत्पति !
मेरे कान्हा!
मेरे कोस्तुभ धारी !
प्रभु क्या मांगू अब ?
जिसको बिन मांगे,
तेरा भक्ति संसार मिला हो ,
वो सबसे  बड़ी  धनवान प्रभु !में 
तुझे पाकर इस आत्मा में अभिभूतहूँ |
मेरे कन्हाई !

क्या कहू कान्हा !
जिस और देखू तेरे स्नेह का उजाला 
सारे अँधेरे मिटा गया जीवन के !
जो लेती रही में रोम -रोम तेरा नाम |
कान्हा  जी!
न देते आप मुझे ये उजाले तो भी 
मेरी आत्मा तेरी ही दासी रहती |
जिसे मिला हो आप का दासत्व वो और क्या मांगे ?


तेरा स्नेह टपके इन,
अखियों से बनके सुखकर नीर ,
मेरी आखो में मदहोशी तेरी भक्ति की ,
तेरे अपार स्नेह की ,मेरे कृष्ण कन्हाई 
तेरा दर्शन नहीं किया मेने आज तक 
फिर भी तेरा स्नेह ,भक्ति संसार पाया मेने 
इस लोक से उस लोक तक 
तीनो लोको की स्वामिनी  बनी हूँ में आज ,
मेरे कोस्तुभ धारी !
क्या मांगू प्रभु ! 
 बिन मांगे भी भर दी 
आप ने स्नेह , भक्ति 
और संसार की ख़ुशियों से मेरी झोली खाली |


वाह रे बनवारी ! मेरे गिरधारी !
श्याम सलोने
तेरी माया अपरम्पार ,
न दे तो जिस्म से जान चुरा ले प्रभु !
और दे तो एक पल में दे त्याग ,सारी हुकूमत प्यारी 
मेरे कान्हा तेरी सरलता ,
पे में जाऊ बलिहारी !
यु ही बस मिटती जाऊं
हर जनम मुझे कान्हा नाम की भक्ति दीजो प्रभु !
मेरे कोस्तुभ धारी को ही मेरा आराध्य कीजो

हाजारो जनम भी पाउंगी ,
तो नहीं चुका सकुंगी , 
तेरे स्नेह की कीमत सारी ,

ओ मेरे कान्हा !
ओ मेरे गिरिधारी !


अब जाना क्या सुख था |मीरा के पास ,
क्यों राधा भी इतनी दीवानी थी ?

जिस स्नेह मधु को उन्होंने चखा 
कितना अद्भुत मीठा हैं वो !
वो मिठास बन बसे मेरे शबदो में सदा ये वर दीजो |
और कुछ दीजो न दीजो ,
अपनी चरनन धूलि मस्तक पे लगाने का दासत्व दीजो |
तेरी मधुर मुरली में जब में खो जाऊ होश नहीं दुनिया का ,
कही जब हाथ जले तो में सुध पाऊ!
त्याग दिया संसार मेने 
तेरे नाम में 
मेरे कान्हा !

बस ऐसा ही मुझे स्वच्छ निर्मल बनाए राखियों मेरे कान्हा !
तेरी ही लीला हैं ,
तेरा ही आदेश ,आत्मा जो  मिटीहैं |
पल -पल इन साँसों में ले तेरा नाम |
चाहे कह दूँ  ,
में कृष्ण!
, चाहे कह दूँ ,
में राम !
आप के श्री चरणों में मेरे कन्हाई 
अनुभूति