शनिवार, 28 मई 2011

हमें रास्तो की जरूरत नहीं !हमें तेरे पैरों के निशा मिल गये हैं |


मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कान्हा !
के श्री चरणों में अर्पित एक अत्यंत भावमयी रचना ,
एक -एक शब्द आत्मा को छूकर जाता हुआ.|
हमें रास्तो की जरूरत नहीं ,हमें तेरे पैरों  के निशा मिल गये हैं |
जन -जन की सेवा यही मेरी पूजा ,
तुम ही तुम हो कोई न दूजा ,
तुमसे  हैं सब कुछ रोशन ,
कण -कण में तू हैं |
अनुभूति

तेरी भक्ति की शक्ति,


मेरे कोस्तुभ धारी!
मेरे
मुरली मनोहर !
तेरी
भक्ति की शक्ति,
तेरे विश्वास का उजाला ,मेरे चेहरे पे चमके ,
तेरे अनन्य अनुराग का तेज ,
मेरी रूह से झलके ,
कान्हा !तुझसे ये प्रीत जो जोड़ी ,
मेरा रोम -रोम कर दिया पावन ,
तेरी भक्ति की शक्ति ने
इन धवल वस्त्रो में ,मेरी आत्मा भी धवल हें|
प्रभु!मेरी आत्मा में बसे ,
तेरे अक्ष्णु विशवास की तरह , 
मेरे मस्तक के रक्त बिंदु की तरह
फैला जीवन में नव सृजन का ये उजाला
तेरे श्री चरणों में शीश नवा के |
ओ कोस्तुभ धारी!
पाकर आप को इस आत्मा में धन्य हुई |
आप के श्री चरणों में कान्हा जी


अनुभूति

फ़रिश्ता


इंसान के बुत की करू इबादत केसे ?
में तो करती हूँ फ़रिश्ते की बंदगी|
इंसान तो अक्सर दे दिया करते हैं,
धोखा जीवन के रास्तो पे ,
फ़रिश्ते तो साथ होकर भी दीखते नहीं ,
जीवन के रास्तों पे |
खुदा मिला मुझे अगर तो कहूँगी 
दे दे मुझे संसार का दुःख सारा ,
अगर बदले में
जो दुवाओं में फ़रिश्ता कोई तुम सा मुझको आ मिले |
मांगने को और कोई सोगात बाकी नहीं
जो जीने को इन सांसों में  नाम आप का मिले|

अनुभूति