रविवार, 22 मई 2011

जीवन का यथार्थ सत्य


बन के खुशबु बिखर गयी हूँ फिजाओं में ,
जब से आई हूँ ,तेरी रूह की पनाहों में,

तेरा यकीन , तेरी दुआएं झलकती हैं मेरे चेहरे पे ,
तेरी खामोशी और तेरा यकीन मुस्कुराता हैं मेरे लबों पे ,

तेरे हाथ जब जुड़ते हैं मेरे लिए दुआओं में ,
में झुकती हूँ तेरे कदमो की इबादत में ,
मेने नहीं देखा खुदा को ,या राम को ,
हां अगर देखा होता तो शायद तुमसे बेहतर वो भी नहीं होता |


मुझे डर किस बात का जब में महफूज हूँ तेरी रूह की मजबूत पनाहों में ,
तेरा विशवास मेरी आँखों से अंगार बन झलकता हैं जिन्दगी की राहो में ,
तेरी हुकूमत माथे की सुर्ख लाल बिंदिया बन सूरज की तरह चमकती हैं |


तुझसे सीखी हैं जिन्दगी की परिभाषा ,
"सत्य परेशान हो सकता हैं पराजित नहीं |"
मेरा विशवास बैचेन हो सकता हैं ,खंडित नहीं |

तुम्हरा हर शब्द मुझे जीवन की नयी परिभाषा देता हैं ,
और तुम्हारी रूह मेरी रूह में बस कर उसे अपनाने की हिम्मत  देती हैं


अपनी ख़ामोशी से हर जहर पीना तुमसे ही सीखा हैं ,
तुम्हारी खामोशियों की मौन भाषा मेरी आत्मा सुनती हैं|
"तुम ही तो कहते हो सबभ्रम हैं आत्मा ही अंतिम सत्य हैं |"

तुम स्वीकार करो न करो ,
तुम ही मेरे जीवन का यथार्थ सत्य हो ,
कोई भ्रम या कल्पना नहीं ,
मेने स्वीकार किया हैं 
तुमको अपनी आत्मा से अपना ईश्वर अपना राम ,
अपना कृष्ण मान कर, अपना आराध्य  मान कर 
मेरे लिए मेरी भक्ति , श्रद्धा ,मेरा स्नेह समर्पण सब कुछ सिर्फ तुम ही हों |
मेरे कन्हियाँ ,मेरे राम
यूँ ही बस अपने हाथों को मेरे लिए दुआओं में उठायें रखना ,
ताकि में ता उम्र निभाऊ सकूँ अपने वचनों को ,
और करती रहूँ तुम्हारे कदमो की निस्वार्थ बंदगी |
"अनुभूति "

जिन्दगी के मालिक .

 मेरे कान्हा ,
मेरी जिन्दगी के मालिक . 

तेरी हर मुस्कुराहट से ज़िंदा हूँ में ,
तुम मुस्कराते रहो तो मुस्कुराती रहूंगी में भी 
बस ये ही दुआ हैं |
अनुभूति