बुधवार, 16 मार्च 2011

सपने



सपने
जब सत्य के धरातल पर ,
 सत्य का धरातल यानी दुनियां ,वास्तविकता }
आकर टकराते हैं,
और टूटते हैं ,
तो बहुत तकलीफ होती हैं |

ये जान कर भी,
मन देखना चाहता है सपनें !

लगता है कितनी कडवी हकीकत,
पर क्या करे?
दुनियां ही कुछ इसी तरह की हैं |
पर मन है कि 
सपनो के पीछे भागा फिरता है |

वो कुछ नहीं देखना चाहता,
सिर्फ अपने ही नजरियए से.
दुनियां को देखना चाहता हैं .
और, जब सपने टूटते हैं तो तड़प उठता है |

कैसा है ये बांवरा मन ?
हर बार दुनिया के,
पिंजरे से उड़ कर 
बस अपनी ही हांका करता है |
डरते डरते उड़ना तो चाहता है.

पर अनजाने भय से,
सहम -सहम कर 
बढता है |

और सपना पूरा हो,
इससे पहले ही सवेरे की आँख खुल जाती है ,
और जिन्दगी लौट आती है .
अपनी हकीकत में |
और वो सपना दम तोड़ देता है.

उन्ही उनींदीं आँखों के पीछे 
और सुबह,
चाय की प्याली और श्रीमान के साथ ,
मैं कह रही होती हूँ -

हे ईश्वर !
अच्छा हुआ 
ये एक सपना था 

धीरज !