रविवार, 8 मई 2011

कँहा पुकारू !

कँहा पुकारू ?
जाने कँहा से आये ,
और न जाने कँहा खोगये,
इस दुनिया की भीड़ में ,
इस सुने जीवन को भर दिया स्वप्नों से 
दिखा राह न जाने खो गये 
कँहा खोजू ,कित जाऊ 
किसको कहू अब मन की पीड 
जब जरुरत हैं विपदा में खो गए कँहा 
किस से पुछु जीवन पथ नवीन 
कँहा जाउंगी में इस दुनिया में
घबरा उठी हूँ .
किस राह निकलू ?
अब न सह सकुंगी 
कोई अपमान नवीन .
कहे मन कूद गंगा में पा जाऊं 
सारे संतापों से अंत .
जाते -जाते ले गए आप तो 
मेरे प्राण भी अधीन .
कोई द्वार मुझे नहीं दिखता 
न कोई संगी साथी .
पुकारू कान्हा तो,
वो  भी हो गया मौन ,
साथ नहीं मुझको कोई राह दिखा जाओ ,
समझ नहीं रहा कुछ भी
मेरे मालिक
कही तो कोई रौशनी की किरण दिखा जाओ |

अनुभूति

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