सोमवार, 16 मई 2011

चाँदनी


आज रात,
का वो चाँद,
घंटो खिड़की से,
मुझे झाकता ही रहा .
घंटो उससे बाते करने वाली 
राम जी की चिड़ियाँ 
आज खामोश थी | 
 खामोशा सा पंखा मुझे देखा ही रहा 
आज वो भी स्तब्ध था ,
आज चाँद की
चाँदनी बूंदें बन
टिप-टिप गिर  ,
तकिया भिगो रही थी| 
आज कोई झगड़ा ,
स्नेह ,शिकायत ,
कोई आत्मआनंद अनुभूति ,
मिलो तक नहीं थी |
सब कुछ खामोश  पडा था,
नीरव मन की तरह 
बस कही किसी कोने से,
टूटा हुआ विशवास
चाँदनी के साथ ,
आँखों सेबूंद -बूंद बहा  जा रहा था |
एक तीखी सी चुभन,
आत्मा को भेद रही थी 
आज राम जी चिड़ियाँ और चाँद 
एक दुसरे को घंटो देखते रहे |
आज सब कुछ स्तब्ध था ,
मिलो तक ख़ामोशी थी |
हमेशा की तरह 
सब कुछ सर झुकाकर ,
एक वचन के लिए ,
तुमने मान ही तो लिया था |
आज चाँद घंटो मुझे,
खिड़की से देखता ही रहा
और उसकी चांदनी एक तीखे से दर्द के साथ 
तकिया भिगोती रही |
घंटो बाते करने वाली राम जी की,
चिड़ियाँ आज खामोश थी |
राम जी केसा इन्साफ हैं तेरी दुनिया का !
अनुभूति

कोई टिप्पणी नहीं: