गुरुवार, 5 मई 2011

मोक्ष |

ओ कान्हा ,
में जीवित हूँ 
क्योकि तुमने मुझे जीवंत बनाया हैं |
एक बेजान आत्मा को तुमने ,
अपनी अनुपम भक्ति का मार्ग दिखाया हैं |
इस बंजर पड़ी आत्मा की धरती को 
सुप्त पड़े स्नेह  और मातृत्व का बोध कराया हैं |
ये जीवन का नव -सृजन 
तुम्हारे ही श्री चरणों में अर्पित हैं |
मेरे कान्हा !
क्रोध .मोह , ये सब तो आवेश हैं पल भर के 
तेरी भागवत , और गीता न होती ,
तो ये समझ भी नहीं आती  |
तेरा प्रत्यक्ष दर्शन  करती हैं मेरी आत्मा |
इस  आत्मा के स्वामी बनकर सदा यूँही
मेरी कामनाओ का दमन करना 
बनने मत  देना मुझे स्वार्थी , 
सदा मेरी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना
उस  लोक से इस  लोक  में सदा 
मेरे जीवन की हर साँस पर
अपना ही अधिपत्य समझना |
इस चरण दासी को 
अपने श्री चरणों में यूँही स्थान देना |
मेरे कान्हा इस संसार की सबसे बड़ी धनी हूँ
क्योकि मेरी हर साँस ,मेरे रोम-रोम 
और मेरे मस्तक के रक्त बिंदु से 
मेरे कदमो की छाया पे भी तेरा नाम  लिखा हैं |
तेरी इस अनुपम भक्ति और स्नेह को पाकर a
कोई और कामना बाकी नहीं |
हे वासुदेव ,
मुझे अब बुला लो अपने क्षीर सागर 
में ,और कुछ पल ही सही दे दो ,
अपनी चरण सेवा का सोभाग्य
ताकि तुहारी चरण सेवा करते करते ,
में पा जाऊ मोक्ष |
कृतार्थ करना ,
मेरे कान्हा !
मेरे वासुदेव !
मेरे राम  !

 
"तुम्हारे श्री चरणों अर्पित"
   प्रभु ! तुम्हारी अनुभूति


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