बुधवार, 28 जुलाई 2010

दोस्ती



जब भी कहीं सुनती हूँ 
आज कल की दोस्ती को ,

एक टीस सी उठती है,
हर तरफ दोस्ती की आड़ में दगा होता हैं | 

क्यों हर बार जिन्दगी की आड़ में ,
मौत का सौदा हो रहा होता है ?

किसे कहे?
किसे समझाएं ?

हर पल ,हर कदम 
कहीं न कहीं 
ये दगा हो रहा होता हैं|

क्यों हर बार 
मासूम सी जिन्दगी की आड़ में ,
मौत का भला होता हैं ?

फरिश्तों पे भी विश्वास करने से डरता है,
एक मासूम इंसान का दिल .


क्योकि , कही न कही ,

दोस्त की आड़ में भी ,
कोई दुश्मन छिपा होता है |


-- अनुभूति