मंगलवार, 19 जनवरी 2010

GHUTAN: माँ

GHUTAN: माँ

माँ

क्या होती है माँ ?
नहीं पता मुझको ,क्योकि मै बन नहीं सकी कभी माँ
हां अपनी माँ के साकार रूप को देखा है मेने ,
इसीलिए ही शायद मन अपने स्त्री होने के अपने अस्तित्व को खोज रहा है
मुझको याद है उसका अलसुबह उठ जाना ,हमारे लिए तैयारी करना
कितना प्यार गुंधा होता था ,उन मैथी के पराठो मै ?
हां ,अब मुझको पल पल याद आता है जब मै नहीं बन सकी हु एक माँ
माँ के सपनो के आँगन से तो मै निकल आई हु यतार्थ जीवन मै
और हां बन नहीं सकी हु माँ
हां माँ कभी मै रो नहीं सकी तुम्हारी गोद मै सर रखे ,किस्मत से शिकायत किये की मै नहीं बन सकी हु माँ
जानती हु मै जब तुम देखती हो मुझको किसी खिलोने से खेलते हुए तो क्या सोच रही होती हो ?
और होले से एक आवाज लगाकर कहती हो ,अरे क्या बचपना है ये !
मै जानती हु ,तुम कभी मेरे असीम दर्द का कोई अहसास मुझको नहीं कराना चाहती |
इसीलिए मुझको एक हलकी सी आह्ट से ही खीच लेती हो ,अपने आँचल मै
सच कहू तुमको पाकर सारे दर्द भूल जाती हु और बन जाना चाहती हु एक बार फिर वही छोटी सी तुम्हारी बेटी
हां तुम्हारा ह्रदय बड़ा विशाल है की तुमहंस कर छिपा देती हो या कभी डांट कर
मुझको पता है एक किसान तभी खुश होता है जब उसकी बचाई बिजवारी भी उसको भरपुर फसल देती है |
पत्थर पूजते पूजते भी अब हार गयी हु माँ ,
इसीलिए भाग जाना चाहती हु ,इस दुनिया से दूर छीप जाना चाहती हूँ तुम्हारे आँचल मै
हां इसीलिए की कभी ना बन सकुगी माँ |



पत्थर का मसीहा




श्रद्धा से पूजे कोई" पत्थर" तो वो भी बन जाए खुदा ,
हम तो पूजे पत्थर ,वो पत्थर जो बन बैठा है मसीहा

कहते रहे लोग विशवास नहीं करना 
और हम लगाये बैठे है आस एक पत्थर से

ये विशवास ही तो है मेरा राम के पूज रहा मन एक पत्थर
जानता है मन एक दिन तो पत्थर भी जाग उठेगा मेरी करुणपुकार से,

और भर देगा मेरा आँचल अपने दुलार से ,
हां सब कुछ श्रद्धा और विशवास का ही तो खेल है ये

कि मान बैठा है एक पत्थर को मसीहा
हां वो पत्थर का मसीहा कभी तो देखेगा 

,प्यार भरी निगाहों से मेरे खाली आँचल को भी ,
और देगा जीवन को नया नाम ,और नया रूप

हां कभी तो वो पत्थर भी बन जाएगा मेरे लिए" पत्थर का मसीहा "|