सोमवार, 18 जनवरी 2010

कुछ नहीं पता



हम तुमको चाहे या ना चाहे ये खुद हमको भी पता नहीं
ये सिलसिला क्यों है खुद नहीं पता
तुझमे दुन्दते है खुदा हमको मिलेगा या नहीं हमको नहीं पता
फिर भी बेबस से घूमते है हम तेरा नाम दिल से लगाए क्यों ?
ये खुद भी नहीं पता |
क्यों कर बैठा है दिल ये खता खुद हमको भी नहीं पता ?
तेरी बंदगी मै है जो मजा ,वो खुद तुझको भी नहीं पता ।
श्रद्धा का अर्थ जाना है जीवन से ,साकार रूप पाया तुममे ,
सब कुछ क़हा फिर भी बहुत कुछ क़हा अनकहा ,क्यों?
ये खुद मुझको भी नहीं पता ।
क्या,तलाशता है तुझमे दिल खुद मुझको भी नहीं पता ?
सोचा नहीं था ,ये मोड़ भी आयेगा ,की तुम साथ होंगे तो जी उठेगा फिर मन
खिल उठा है मन का रोम रोम खिली खिली धुप की तरह
तुम चाँद हो या सूरज खुद मुझको भी नहीं पता ?
हां सुनहली धुप हो या ठंडी चांदनी खुद खिल उठी जिन्दगी को भी नहीं पता ?
या सब कुछ सामने है फिर भी मुझको कुछ नहीं पता ?
की क्या है ये ?
सजा या खता ?







जीवन और तुम

तुम और ये जीवन दोनों एक दुसरे के पूरक हैं
तुम बिन जीवन नहीं ,तुम बिन मै नहीं
मेने पाया है तुममे वो पूरा इंसान जो मुझको कही पति नहीं नजर आया ,
मेरे शब्दों को तुमने ही दिया है साकार रूप ,
और जीवन जीवन को दिया है सार्थकता का साथ
हां तुम ,वो धीरज ही तो हो ,जिसके बिना जीवन का कोई मोल नहीं
कभी कह नहीं पाती वो हजारो बाते तुमको जो पग पग देती है मेरा साथ
और तुमको समझा नहीं पाती ,अपनी घुटन
मुझको तलाश है आध्यात्म की ।
और तुम्हारे स्नेह ने बना रखा है मुझको अपने काँधे की चिड़िया
तुमने ही दिया है जीवन को अनंत सोच का आकाश
फिर क्यों अपने काँधे पे ही बिठाये रखना चाहते हो अपनी इस चिड़िया को ?
तीसरी फ़ैल कहते कहते ,तुमने मुझको ला खड़ा किया है जीवनको पी एच डी के सामने
क्यों ,डरता है तुम्हारा असीम स्नेह की कही धारण ना करलू कोई भगवा ?
नहीं ,मेने तुम्हारे रंग का भगवा धारण किया है और अब मै शायद इस जन्म मै और किसी रंग मै ना रंग सकू|

कैसे समझाऊ तुमको ?
जीवन की ये धारा अब जिस और मुड़ चली है वो अब किसी बंधन मै बंधा नहीं है|
वो मुक्त है ,अनंत आकाश का राहू है ,जो पाना नहीं,देना चाहता हैं |
अपना जीवन समर्पित करना चाहता है दुखियों की सेवा के नाम

क्यों समझा नहीं पारही ये घुटन तुमको ?
शायद इसीलिए की तुम और जीवन एक दुसरे के पूरक हो !