गुरुवार, 29 जुलाई 2010

हिना


ये कविता किसी बहुत बड़े दार्शनिक या विद्वान के लिए नही है |
ये कविता है घर-घर जाकर काम करने वाली एक साधरण सी लड़की हिना के लिए   |


तुम्हे सलाम करती हूँ हिना 
सलाम करती हूँ .

जिन्दगी की मुश्किलों से लड़ने की
तुम्हारी ताकत को . 

तुम मेरे लिए बहुत ख़ास हो 
तुम्हारी वे मासूम सी बातें 
और, 
अपने परिवार के पांच लोगो को पालने का बोझ ,
और,
उसमे दम भरती तुम्हारी सपने देखने की चाहतें .

कितने ख़ूबसूरत,सरल और सच्चे सपने हैं तुम्हारे .

वे कभी कानो के बूंदों की फरमाइश
और उन्हें पहनकर बहुत खुश होना,
और अपने को एक टक सा आईने में निहारना 

कितना सुन्दर और जीवंत होता है 
तुम्हारा हर एक सपना 

तो, कभी मुझसे दाल -चावल खाने की फरमाइश करना .
सोचती हूँ ,
तुमसे सीखना चाहिए उन लोगो को ,
जो हार कर घर बैठ जाते हैं ,
और अपने सपनो को आँखों में ही लिए,
 दम तोड़ देते हैं .

और किस्मत का दोष निकालकर रोते हैं |

अहले सुबह ,
जब दुनिया बिस्तर में ही होती है
 एक मासूम सी 

पद्रह साल की लड़की ,
सुबह छ बजे दरवाजा खटखटा रही होती है  |

सुबह के दस बजे मोहल्ले का काम निबटा कर .
तुम भूखे पेट ही चल देती हो स्कुल ,
अपने पढने की चाहतो को मन में समेटे ,

और , शाम को पूछने पर कह दिया करती है -
"दीदी भूख ही नहीं लगती "

मुझे अन्दर तक डरा देते हैं तुम्हारे ये शब्द !
हर रविवार को चाँद निकलता है,
  दिन में ,

सारी मुश्किलें , सारा दर्द , 
सब कुछ रविवार को कहीं नहीं होता 

क्योकि हर रविवार को 
 चाँद ,
हिना के चेहरे पर चमक रहा होता है |

उस चाँद के आगे हम दोनों भूल जाते हैं और 
उसके सपनो के सौदागर की बातो में कही खो जाते हैं |

कितनी आरजू हैं उसकी की,
 वो भी दुल्हन बने 
सोचती हूँ ,
कुछ सुलझाने की कोशिश करती हूँ .

क्या हिना अपने सारे लोगो को छोड़ कर 
कभी अपने हाथो में रचा पाएगी हिना ?

हर बार
ये पूछने पर कि तेरे बाद,
इन भाई -बहनों का ,
और बीमार माँ का क्या होगा ?

हिना कुछ नहीं कहती ,
खो जाती हैं 
अपनी कडाही और चाय की भगोनी में ,

और, में खो जाती हूँ
इसी सवाल में कि कब रचेगी 
हिना के हाथो में भी हिना ?

सलाम करती हूँ तुम्हे मै हिना ,

क्योकि ये समाज बड़ी बड़ी बाते ही करता रहेगा ,
तुम्हे ये नहीं दे सकेगा अपने सपनो का सौदागर .

तुम्हारा नाम नहीं होगा किसी पुरस्कार या सम्मान की सूची  में ,
इसी लिए कोशिश करुँगी की मिलवा सकूँ 
तुम्हे अपने सपनो के सौदागर से.
 
में कामयाब रहूँ दोस्तों,
 यही दुआ करना |

हां , 

हिना ,
 सलाम करती हूँ तुम्हे...

-- अनुभूति 

बुधवार, 28 जुलाई 2010

दोस्ती



जब भी कहीं सुनती हूँ 
आज कल की दोस्ती को ,

एक टीस सी उठती है,
हर तरफ दोस्ती की आड़ में दगा होता हैं | 

क्यों हर बार जिन्दगी की आड़ में ,
मौत का सौदा हो रहा होता है ?

किसे कहे?
किसे समझाएं ?

हर पल ,हर कदम 
कहीं न कहीं 
ये दगा हो रहा होता हैं|

क्यों हर बार 
मासूम सी जिन्दगी की आड़ में ,
मौत का भला होता हैं ?

फरिश्तों पे भी विश्वास करने से डरता है,
एक मासूम इंसान का दिल .


क्योकि , कही न कही ,

दोस्त की आड़ में भी ,
कोई दुश्मन छिपा होता है |


-- अनुभूति 

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

जिन्दगी

एक कविता मेरे पिता आदरणीय श्री रतन चौहान के कविता संग्रह
 '' टहनियों से झांकती किरणें ''

 से 

============

हवा में लिपटा धुंआ
हांडी में पकते टमाटर की खुशबू ,
और कुछ बारिश ,
बारिश का भीगापन

बाहर आई काली मिटटी को जी छूना चाहता हैं
नए मकान  की नींव खुद रही है.

लोग ताप रहे हैं,
और कांच के टुकड़े में 
अक्स देखती लड़कियां 
कंघी कर रही हैं

काम पर जाने से पहले
टहनियों से झाँक रही हैं किरणे.

कही ढोल बज रहा है
उठ रहा है स्वर,
गूंजता हुआ,

-- अनुभूति  

द्वारा 

 सादर साधिकार प्रस्तुत .

रविवार, 25 जुलाई 2010

पथ -प्रदर्शक



पथ -प्रदर्शक ! 

मै नहीं जानती थी ,
सब कुछ इतने कम समय में बदल जाएगा |

एक अल्हड लड़की,
या, मै यूँ काहूँ कि बहती नदी ,
यूँ ठहराव को पा लेगी .

सुकून उसकी सांसो में  होगा ,
और जिंदगी उसकी राहों मै .

अगर तुम ना मिलते यूँ  मुझे
तो ऐसा नहीं होता .

इतना ही कहूँगी बस,
अपना स्नेह ,ज्ञान और आशीष,
मुझ पर यूँ ही बरसाते रहना ,

मेरे मालिक
मेरे पथ -प्रदर्शक

मै आप को गुरु नहीं कहती ,
क्योकि आप तो साथी भी हो जिन्दगी के
इतना कहूँगी बस 
गोविन्द का रास्ता दिखाने वाले भी आप ही हो ,

इसलिए
लाखो बार नमन करती है  मेरी आत्मा
आप को 

मेरे मालिक

मेरे पथ -प्रदर्शक.

-- अनुभूति 

शनिवार, 24 जुलाई 2010

तुम्हारे वादे ,

तुम्हारे वादे , 

एक आस जिन्दगी की ,और
तुम्हारे वादे ,

जिन्दगी का फलसफा यही है,
तुम्हारे वादे .

तुम्हारे स्वप्न सुकून देते हैं
 और , तुम्हारा साथ वेदना .

एक डर , 
हाँ एक डर 
मुझे हर पल सताता हैं ,
कि कही तुम, मुझसे बिछड़ ना जाओ |

तुम्हारे इन वादों पे यकीन करना,
तो जिन्दगी चाहती हैं .

पर हर आने वाले पल की आहट
फिर भी मुझे डराती हैं |

तुम्हारी साँसे मुझे 
हर पल विश्वास दिलाती हैं, 
फिर भी हमनशीं  मेरे ,
ये दुनिया मुझे पल -पल डरती हैं|

क्या सत्य हैं ? 
तुम्हारी सांसे या 
तुम्हारे वादे ?

इसी  ख़ुशी और गम 
में  जिन्दगी बिताती हूँ |

हाँ 
फिर भी एक आस जिन्दगी की और तुम्हारे वादे !


-- अनुभूति 

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

जीवन -संगीत




एक झोंका हवा का और ,
और ,तुम्हारी आहटें .

एक पल और ,
और , तुम्हारी चाहतें .

तुम्हारी आहटें ,
और 
जिन्दगी के गीत .
अब तो दोनों बन गए हैं 
मन -मीत .

मेरी खनकती पायल ,
और 
तुम्हारे गीत ,
यही तो है  मेरा 
जीवन -संगीत.

-- अनुभूति 

बुधवार, 21 जुलाई 2010

प्रेम


प्रेम नहीं माँगता किसी से ,
बदले में कोई प्रेम 
प्रेम नहीं माँगता कोई सम्बन्ध
प्रेम तो समर्पण हैं ,
जो सिर्फ देना जानता.

किसी स्वीकारोक्ति की कोई जरुरत  नहीं ,
इस असीम अनुराग में ,
तुम कहो ना कहो ,
पर , तुम यही तो धड़क रहे मुझमे सदा ,

  तुम तो निराकार
  न  कभी तुम मरे ना कभी तुम मरोगे,

 क्योकि तुम तो जीवित हो मुझमे सदा |


-- अनुभूति 

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

आँख -मिचोली


पलकों पे  सपने सजाता हैं जीवन ,
तुम्हारे आने से गाता है जीवन .

 खामोशियों से जब तुम मेरे करीब आक
 निकल जाते हो , 
मै तुम्हारी उसी खुशबू  में महक जाती हूँ .

 किसी पौधे  में पानी डालते -डालते 
जब गुनगुना रहे होते हो ,
 वहीं बहती  हवा बनकर झूम रही होती हूँ मै,

और तुम जब महसूस करने लगते हो मुझे,
एक लहर बन कर उड़ जाती हूँ मै |


-- अनुभूति 
                          

शनिवार, 10 जुलाई 2010

मेरे अस्तित्व का सपना |



रोज सिरहाने रख कर सोती हूँ
  एक सपना ,
हां , एक सपना.

 तुम्हारे  नन्हे , नन्हे हाथो का
  तुम्हारी नन्ही आँखों का
        और, तुम्हारे दुलार और  स्पर्श का .

 दुनिया में  सब से प्यारा और
  सब से मासूम एक सपना,

  तुम्हारे इस दुनिया में आने का सपना ,

      दुनिया में इससे ख़ूबसूरत  कोई सपना नहीं.

    इसीलिए पलकों को थामे इन्तजार कर रही हूँ
      तुम्हारे आने का  ,
   हां मेरे ,पुरे होने का , 

मेरे अस्तित्व का सपना |


-- अनुभूति 

अस्तित्व




आत्मा अमिट हैं 
जानती हूँ मै
इसीलिए बिना इकरार,बिना वादे के,
      फिर भी मानती हूँ ,

 तुमको तो इकरार ,
इनकार में  बदलने का डर होता है .

और वादा फिर भी टूट जाने का डर
    तुम में ही अपने को डुबोकर 
पाया हैं  मैंने अपने आप को.

 कही कुछ खो जाने का  डर नहीं
 ना ही कुछ टूट जाने का,\
 क्योकि, मैंने  कुछ साथ बांधा ही  नहीं,

मैंने तो डुबो दिया हैं अपने को ,
तुम्हारे अस्तित्व में ,
  हां उस निराकार ब्रह में
  यानी तुममे |
  इसीलिए तुम तो सदा साथ हो,

 सदा साथ थे और सदा रहोगे |
   तो क्योकि मेरा तो अस्तित्व ही नहीं तुम्हारे बिना !

-- अनुभूति 

ख़ामोशी

आप की  ख़ामोशी भी ,
   मेरी जिन्दगी की एक अदा हैं
                मुझे आप कहे ना कहे ,
                          पर यूँही ख़ामोशी से मेरे साथ चलते रहना भी आप की  वफ़ा हैं |
             यूँही तडपना और अपनी ही  जिन्दगी से
                                   अपनी शिकायत करना ,
                 ये कुछ ना कह कर भी मेरे लिए चुनी गयीं एक  सजा हैं |
                                    आप की ख़ामोशी से शिकायते नहीं ,
                                              पर अपनी ही जिन्दगी से यूँही शिकवा करना ,
                                                         मेरी ही आँखों को आंसुओ  से नम करना हैं | |

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मन के तार

मन के तार उसी से जुड़ते हैं ,
                            जो जाने मन
        तन की परिभाषा से,
                         कोसो दूर हैं मन
              ये जो जाने ,
                         वो ही जाने  मन को |
               मन दर्पण हो तो जाने मन ,
                                                      मन को
              क्या कहू जब सब कुछ बिन
                          बोले ही समझ लेते हो इस मन को !

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

हम कहे ना कहे विशवास और आत्मा से सदा साथ ही हैं क्यों समझते हो दूर हूँ ?नहीं करीब ही हूँ सदा जीवन की अंतिम सांस तक ,हां साँसों का ऐतबार यूँ ही टूट जाएगा क्या ?
तुम्हारे सवालों का जवाब मै मेरी खमोशी तुम्हारे साथ मेरे होने का एहसास ही तो हैं |