शनिवार, 29 मई 2010

अहसास और तुम

बिन कहे भी सब कुछ कह जाते हो तुम
मेरे आस पास आकर हर अहसास को केसे छु जाते हो तुम |

नहीं मालूम तुमसे रिश्ता क्या हैं मेरा ?
नीत अपने शब्दों से क्यों ?जीने को मजबूर कराते हो तुम |

तुम जानो ,मै जानू हर शब्द के अहसास को
फिर क्यों शब्दों मै उलझाकर रुलाते हो तुम ?

 तुम जानो पल पल तुम्हारे शब्दों के अहसासों को समझू मै
क्यों दूर रह फिर छल जाते हो तुम ?

मै एक टूटी कश्ती जिसका नहीं कोई मंजिल अब ,
फिर क्यों एक बार फिर जीवन के ख्वाब दिखाते तुम ?


मिलो के फासले पर भी रूह मै समाया है तुम्हारा हर अहसास
ये समझ कर भी क्यों तडपाते हो तुम ?

मेरे पास नहीं तुम्हारी तरह जीवन के ज्ञान का सागर
मेरे पास तो हैं बस दर्द की सरिता

मेरे मन के मानस क़हा खोजू तुम को
तुम्हारी विशालता का कोई आदि हैं अंत


क्या कभी खोज पाउगी तुमको ?
पा सकुगी तुमको नहीं मालुम
फिर भी दिवानो की तरह हर शब्द मै खोजती हूँ तुमको 
जानती हूँ ,कहो ना कहो मेरी तरह तुम भी हर पल खोज रहे हो मुझको तुम
केसे कहू  ?
मेरे हर अहसास मै हो तुम हां तुम

2 टिप्‍पणियां:

astrorsbhadauria ने कहा…

"बिन कहे भी सब कुछ कह जाते हो तुम
मेरे आस पास आकर हर अहसास को केसे छु जाते हो तुम |"
अन्तर्मन की भावना भगवान और भक्ति के प्रति कितनी संजीदगी प्रदान करती है.हर व्यक्ति की मनोदशा के अनुसार उसी की भावना को प्रदान करने वाली,वाह ! स्वागत है इस प्रकार की अनौखी भावनाओं का,आशा है प्रयास हमेशा जारी रहेगा,अनवरत और इसी तरह से.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत से गहरे एहसास लिए है आपकी रचना ...