गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

ख़ाब

आँखों के पानी में तैरते तुम
अक्सर बूंदों में ढल जाया करते हो |
तुम्हारे इन आँखों से ढलने का सिलसिला
आजतक रुका ही नहीं ।
यूँ देखो तो तुम्हे गुजरे
सालों बीत गए ,फिर भी तुम्हारे स्नेह की ऑव रोज फूटती है ,और रोज ही आँखों से ढलती है ।
रोज ही तुम्हारे आने की राह देख
मैं साँझ अपनी डियोरि पर अन्तस् में पलते तुम्हारे स्नेह का दीप बालती हूँ मैं ,
ये जीवन की भोर और ये ही साँझ है
तुम्हरा ही दिया रास्ता और तुम ही मंजिल ।
बस चल रही है
जिंदगी की तुम ही तुम मुजसम् हो ।
अनुभूति

रविवार, 12 अप्रैल 2015

तुम को देखा तो ये ख्याल आया ।

जो सोचा नहीं था
जिंदगी ने वो गीत गुनगुनाया ।
कोई खाब आँखों में जब रहा नहीं
ये खाब सजाने कोई
क्यों अजनबी बनकर अपना आया।।
अनुभूति

सोमवार, 30 मार्च 2015

तुम साथ हो

जब भी आँखे बन्द कर तुम्हे पुकारती हूँ
तुम सामने खड़े कहते हो
साथ ही खड़ा हूँ पगली
क्यों घबराती है
क्या विशवास नही अपने गोविन्द पर
पिया, एक तुम्ही पे तो हर स्थिति में मुझे अगाध विश्वास है
बस विचलित होती हूँ
प्रति क्षण बदलते समय से
तुम साथ बह रहे हो
बस इसिलए जी रही हूँ
प्रतीक्षा कर् रही हूँ
द्रोपदी की तरह की
तुम जरूर आओगे ।
पुकारती तुम्हे तुम्हारी अनुभूति।।

रविवार, 29 मार्च 2015

तुम बिन

पिया जी ,

लोग कहते हैं.……विरह कि अग्नि में स्नेह और दीप्त होता हैं।  

अपना होश नहीं होता सब अद्वेत होता हैं………… 

लेकिन जंहा तुम नहीं होते वंहा कुछ नहीं होता……

तुम्हारी बंशी कि धुन के बिन सारा जग सुना हैं....... 

इसी तन्हाई में तुम्हे पुकारती....... तुम्हारी रसात्मिका 

 
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति

सोमवार, 23 सितंबर 2013

अनुभूति





ओ माहे रूह !
मेरे हमनवाज़ !
मैं कोई किताब का पन्ना नहीं जो तुम उसे पलट दो ..
मैं जिंदगी की वो किताब हूँ
जो तुम्हारे हाथो में खुलती हैं
पलटती हैं ....
उसमे रखे मयूर पिख को
एक बार तुम फिर सिरहाने रखकर देखना
मेरी खुशबु से तुम सरोबार हो जाने वाले हो
गौर से अपने कानो की सरगमो को थामना
रोज रात तुम्हारे कमरे तक
आने में ,पेरो में बजती उन पायलो की छम -छम हूँ |
तुम्हारे कदमो में बैठ के
रोज अपना सुख -दुःख गाती एक बावरी हवा हूँ मैं
कोसो दूर से भी
जिन्हें तुम रूह से सुन लिया करते हो
वो अहसास हूँ मैं
ऑर बाँध दिया करते हो अपनी बंधनी समझकर अपने
प्रणय पाश में ,अपने मोहक गीतों की सरगमो में
हां मैं वो खुशबु हो
जो तुम्हारे गीतों से बिखर जाती हैं
चारों ऑर ......
हां मैं सिर्फ एक अहसास हूँ जिसे तुम रूह तक उतार लेते हो
सजा देते हो जिसके लिए सपनो की सेज
हां मैं तुम्हारे प्रणय की रागिनी हूँ
बस एक मीठी सी अनुभूति हूँ पीया
लेकिन कोई अध्याय या किताब का पन्ना नहीं में
जिसे तुम जब चाहो पलट दो
मैं एक जिंदगी हूँ
जिसके दम साज हो तुम .....
हां अनुभूति हूँ मैं एक अहसास बस ...ह्रदय का .....
अनुभूति 
                                                     

शनिवार, 21 सितंबर 2013

तुम ऑर मैं !

 
 
 
 
 
मेरे माधव !
यूँ मुझमे सामाये हो तुम
की होश नहीं ,
मैं तुम हूँ की तुम मैं
रागिनी हूँ मैं पीया तुम्हारी
धर लो न अधरों पे मुझे रागिनी हूँ
रंग में रंग के देख तो लो मन बसिया
तुम जेसा सच्चा कोई नहीं
तुम जिसा निष्पाप कोई नहीं
दुनिया कहे तुम्हे कहे छलिया
कौन जाने इसके पीछे
कितनी अबलाओं को तुमने अपना नाम दिया ....
सम्हाला दुनिया को जीवन का सांचा मार्ग दिया
जो किया कभी छिपा के नहीं
दुनिया के सामने किया
इसलिए तो तुम कहलाओ पगले छलियाँ
तुम छलिया नहीं सांचे मानव हो
जिसने सबको अपना नाम दिया
जिसने जिस रूप में तुम्हे पुकारा
तुमने उसे थाम लिया ..
मुझे भी यूँ ही थामे रहियो मेरे सर्वेश्वर 
मेरे राम .!
तुम्हारी चरण दासी अनुभूति

मैं इन्तजार करुँगी !

 
 मित्रों मेरी एक कविता एक मंच से
 ओ माहे रूह !
मेरे हमदम !
मेरे हमराज !
यूँ स्तब्ध सी मैं तुम्हे जाते देखती ही रह गयी
विवश थी मैं सोचती ही रह गयी जिंदगी से ऐसी क्या खता हो गयी |

तुम मौन थे सदा से ऑर मैं खिखिलाती धुप
कभी नहीं कहते थे मन की बात फिर भी मन में महक रहे थे बन के मधुप |

टूट के मेने तुम्हे चाहा ,लेकिन तुम फिर भी न मुझे समझ सके
दुनिया के ताने -बाने में उलझे तुम मुझसे बिना कुछ कहे फिर रूठ चले |

मैं इन्तजार करुँगी सदा की तरह की तुम लौट आओ
महकते मधुप बनकर फिर मेरा सूना जीवन सजाओ ....|

अनुभूति