गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

ख़ाब

आँखों के पानी में तैरते तुम
अक्सर बूंदों में ढल जाया करते हो |
तुम्हारे इन आँखों से ढलने का सिलसिला
आजतक रुका ही नहीं ।
यूँ देखो तो तुम्हे गुजरे
सालों बीत गए ,फिर भी तुम्हारे स्नेह की ऑव रोज फूटती है ,और रोज ही आँखों से ढलती है ।
रोज ही तुम्हारे आने की राह देख
मैं साँझ अपनी डियोरि पर अन्तस् में पलते तुम्हारे स्नेह का दीप बालती हूँ मैं ,
ये जीवन की भोर और ये ही साँझ है
तुम्हरा ही दिया रास्ता और तुम ही मंजिल ।
बस चल रही है
जिंदगी की तुम ही तुम मुजसम् हो ।
अनुभूति

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